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Siddharth Saaz
gar koii mujhse aakar kahtaa yaar udaasi hai
gar koii mujhse aakar kahtaa yaar udaasi hai | गर कोई मुझ सेे आकर कहता, यार उदासी है
- Siddharth Saaz
गर
कोई
मुझ
सेे
आकर
कहता,
यार
उदासी
है
मैं
उसको
गले
लगाकर
कहता,
यार
उदासी
है
होता
दरवेश
अगर
मैं
तो
फिर
सारी
दो-पहरी
गलियों
में
सदा
लगाकर
कहता,
यार
उदासी
है
- Siddharth Saaz
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दिल-ए-सोज़ाँ
को
भी
महका
रहे
हैं
हमें
जो
ख़्वाब
तेरे
आ
रहे
हैं
तेरे
शैदाई
पागल
हो
चुके
हैं
तिरी
तस्वीर
चू
में
जा
रहे
हैं
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Siddharth Saaz
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कभी
दरिया
में
जिनकी
कश्तियाँ
थी
वही
अब
साहिलों
पे
रो
रहे
हैं
Siddharth Saaz
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चाँद,
सूरज
और
बादल
देखकर
हँस
रहा
था
एक
पागल
देखकर
मैं
समझता
हूँ
जुनून-ए-इश्क़
भी
दौड़
पड़ता
हूँ
मैं
जंगल
देखकर
वो
शिकारी
पहले
इंसाँ
था
तभी
रो
दिया
था
मुझको
घाइल
देखकर
वो
उठाएगा
नज़र
तो
कोई
भी
डूब
जाएगा
वो
दलदल
देखकर
लम्स
तक
उसके
बदन
का
याद
है
उसकी
याद
आती
है
मख़मल
देखकर
हीरे
तक
के
भाव
कम
होने
लगे
उसकी
वो
चाँदी
की
पायल
देखकर
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Siddharth Saaz
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इन्हीं
रस्तों
पे
हम
तुझ
सेे
मिले
थे
इन्हीं
रस्तों
पे
तुझको
खो
रहे
हैं
Siddharth Saaz
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मिलेगी
क़ैद
से
कैसे
रिहाई
कौन
सोचेगा
यहाँ
तेरे
सिवा
तेरी
भलाई
कौन
सोचेगा
ज़माने
भर
का
तू
सोचेगा
तो
फिर
तेरे
बारे
में
मुझे
तू
ही
बता
दे
मेरे
भाई,
कौन
सोचेगा?
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Siddharth Saaz
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