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Gulshan
apna kirdaar ham dikha denge
apna kirdaar ham dikha denge | अपना किरदार हम दिखा देंगे
- Gulshan
अपना
किरदार
हम
दिखा
देंगे
चोट
खाकर
भी
मुस्कुरा
देंगे
तेरे
ख़्वाबों
में
ऐ
मेरे
हमदम
रंग
उल्फ़त
के
हम
मिला
देंगे
इश्क़
की
रहगुज़र
में
आ
जाओ
अपनी
पलकों
को
हम
बिछा
देंगे
उनको
लाओ
बुला
के
ऐ
लोगों
वो
ही
बीमार
को
दवा
देंगे
सुनके
दीवाने
वो
हुए
जिसको
वो
ग़ज़ल
तुमको
हम
सुना
देंगे
उठके
जाने
की
ज़िद
करोगे
तब
तुमको
अपनी
क़सम
दिला
देंगे
जीत
लो
दिल
अगर
गरीबों
के
दामन-ए-दिल
से
यह
दु'आ
देंगे
साथ
तेरा
अगर
मिले
'गुलशन'
आशियाँ
प्यार
से
सजा
देंगे
- Gulshan
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उम्र
के
आख़िरी
मक़ाम
में
हम
मिल
भी
जाए
तो
क्या
ख़ुशी
होगी
क्या
सितम
तुम
को
देखने
के
लिए
हम
को
दुनिया
भी
देखनी
होगी
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Vikram Sharma
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बिछड़े
तो
रख
रखाव
भी
करना
नहीं
पड़ा
ताज़ा
किसी
को
घाव
भी
करना
नहीं
पड़ा
बस
देख
कर
ही
उसको
परिंदे
उतर
गए
उसको
तो
आओ
आओ
भी
करना
नहीं
पड़ा
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Azbar Safeer
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सारी
दुनिया
के
ग़म
हमारे
हैं
और
सितम
ये
कि
हम
तुम्हारे
हैं
Jaun Elia
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ख़ून
से
सींची
है
मैं
ने
जो
ज़मीं
मर
मर
के
वो
ज़मीं
एक
सितम-गर
ने
कहा
उस
की
है
Javed Akhtar
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ठीक
से
ज़ख़्म
का
अंदाज़ा
किया
ही
किसने
बस
सुना
था
कि
बिछड़ते
हैं
तो
मर
जाते
हैं
Shariq Kaifi
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हाथ
काँटों
से
कर
लिए
ज़ख़्मी
फूल
बालों
में
इक
सजाने
को
Ada Jafarey
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शाख़-दर-शाख़
होती
है
ज़ख़्मी
जब
परिंदा
शिकार
होता
है
Indira Varma
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रोने
को
तो
ज़िंदगी
पड़ी
है
कुछ
तेरे
सितम
पे
मुस्कुरा
लें
Firaq Gorakhpuri
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सितम
भी
मुझ
पे
वो
करता
रहा
करम
की
तरह
वो
मेहरबाँ
तो
न
था
मेहरबान
जैसा
था
Anwar Taban
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किनारे
दो
मिलाने
में
हैं
कितनी
मुश्किलें
सोचो
ये
पुल
दिन
भर
ही
सीने
पे
बिचारा
चोट
खाता
है
Prashant Beybaar
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अगन
में
जुदाई
की
जलते
हुए
कटी
रात
करवट
बदलते
हुए
पता
मंज़िलों
का
उन्हीं
को
मिला
चले
जो
भी
गिरते
सँभलते
हुए
मिला
ठोकरों
के
सिवा
और
क्या
सदाक़त
की
राहों
पे
चलते
हुए
जो
आया
है
उसका
है
जाना
अटल
ये
कह
कर
गया
सूर्य
ढलते
हुए
कठिन
इतनी
होगी
जहाँ
की
डगर
न
सोचा
था
घर
से
निकलते
हुए
तक़ाज़ा
समय
का
जो
समझे
नहीं
रहे
हाथ
'गुलशन'
वो
मलते
हुए
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Gulshan
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बे-सबब
मुस्कुराना
ज़रूरी
नहीं
इस
तरह
ग़म
छुपाना
ज़रूरी
नहीं
आँख
में
गर
समुन्दर
बनें
तो
बनें
आँसुओं
को
बहाना
ज़रूरी
नहीं
कौन
है
जो
तुम्हारी
कहानी
सुने
ग़म
सभी
को
दिखाना
ज़रूरी
नहीं
तुम
सफ़र
में
अकेले
चलोगे
यहाँ
साथ
देगा
ज़माना
ज़रूरी
नहीं
बर्क़
गिरती
रहेगी
चमन
में
मगर
ख़ाक
हो
आशियाना
ज़रूरी
नहीं
तीर
भी
अब
चलें
कुछ
नए
ढंग
से
चूक
जाए
निशाना
ज़रूरी
नहीं
हस्ब-ए-मामूल
उसने
है
वा'दा
किया
उसका
वा'दा
निभाना
ज़रूरी
नहीं
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Gulshan
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छोड़
रहे
हो
अच्छा
है
तुम
तो
ये
भी
कर
सकते
हो
मैं
तो
जिस
से
मिल
जाता
हूँ
साथ
निभाने
लगता
हूँ
Gulshan
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भूखे
थे
और
भूखे
ही
रह
जाएँगे
मर
जाएँगे
हाथ
नहीं
फैलाएँगे
Gulshan
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सफ़र
को
बीच
में
हम
छोड़कर
वापस
चले
आते
इशारा
लौट
आने
का
किसी
ने
तो
किया
होता
Gulshan
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