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Gulshan
agan men judaai ki jalte hue
agan men judaai ki jalte hue | अगन में जुदाई की जलते हुए
- Gulshan
अगन
में
जुदाई
की
जलते
हुए
कटी
रात
करवट
बदलते
हुए
पता
मंज़िलों
का
उन्हीं
को
मिला
चले
जो
भी
गिरते
सँभलते
हुए
मिला
ठोकरों
के
सिवा
और
क्या
सदाक़त
की
राहों
पे
चलते
हुए
जो
आया
है
उसका
है
जाना
अटल
ये
कह
कर
गया
सूर्य
ढलते
हुए
कठिन
इतनी
होगी
जहाँ
की
डगर
न
सोचा
था
घर
से
निकलते
हुए
तक़ाज़ा
समय
का
जो
समझे
नहीं
रहे
हाथ
'गुलशन'
वो
मलते
हुए
- Gulshan
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उस
मेहरबाँ
नज़र
की
इनायत
का
शुक्रिया
तोहफ़ा
दिया
है
ईद
पे
हम
को
जुदाई
का
Unknown
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अभी
तो
जान
कहता
फिर
रहा
है
तू
तुझे
हम
हिज्र
वाले
साल
पूछेंगे
Parul Singh "Noor"
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इक
तेरा
हिज्र
दाइमी
है
मुझे
वर्ना
हर
चीज़
आरज़ी
है
मुझे
Tehzeeb Hafi
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उसकी
टीस
नहीं
जाती
है
सारी
उम्र
पहला
धोखा
पहला
धोखा
होता
है
Shariq Kaifi
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तुम
पूछो
और
मैं
न
बताऊँ
ऐसे
तो
हालात
नहीं
एक
ज़रा
सा
दिल
टूटा
है
और
तो
कोई
बात
नहीं
Qateel Shifai
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मगर
गुज़ारनेवालों
के
दिन
गुज़रते
हैं
तेरे
फ़िराक़
में
यूँँ
सुबह-ओ-शाम
करते
हैं
Faiz Ahmad Faiz
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लो
फिर
तिरे
लबों
पे
उसी
बे-वफ़ा
का
ज़िक्र
अहमद-'फ़राज़'
तुझ
से
कहा
ना
बहुत
हुआ
Ahmad Faraz
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ख़्वाबों
को
आँखों
से
मिन्हा
करती
है
नींद
हमेशा
मुझ
सेे
धोखा
करती
है
उस
लड़की
से
बस
अब
इतना
रिश्ता
है
मिल
जाए
तो
बात
वग़ैरा
करती
है
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Tehzeeb Hafi
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दबी
कुचली
हुई
सब
ख़्वाहिशों
के
सर
निकल
आए
ज़रा
पैसा
हुआ
तो
च्यूँँटियों
के
पर
निकल
आए
अभी
उड़ते
नहीं
तो
फ़ाख़्ता
के
साथ
हैं
बच्चे
अकेला
छोड़
देंगे
माँ
को
जिस
दिन
पर
निकल
आए
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Mehshar Afridi
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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कोई
उम्मीद
मत
सज़ा
गुलशन
तिरी
खुश्बू
का
वास्ता
है
तुझे
Gulshan
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अपना
किरदार
हम
दिखा
देंगे
चोट
खाकर
भी
मुस्कुरा
देंगे
तेरे
ख़्वाबों
में
ऐ
मेरे
हमदम
रंग
उल्फ़त
के
हम
मिला
देंगे
इश्क़
की
रहगुज़र
में
आ
जाओ
अपनी
पलकों
को
हम
बिछा
देंगे
उनको
लाओ
बुला
के
ऐ
लोगों
वो
ही
बीमार
को
दवा
देंगे
सुनके
दीवाने
वो
हुए
जिसको
वो
ग़ज़ल
तुमको
हम
सुना
देंगे
उठके
जाने
की
ज़िद
करोगे
तब
तुमको
अपनी
क़सम
दिला
देंगे
जीत
लो
दिल
अगर
गरीबों
के
दामन-ए-दिल
से
यह
दु'आ
देंगे
साथ
तेरा
अगर
मिले
'गुलशन'
आशियाँ
प्यार
से
सजा
देंगे
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Gulshan
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बे-सबब
मुस्कुराना
ज़रूरी
नहीं
इस
तरह
ग़म
छुपाना
ज़रूरी
नहीं
आँख
में
गर
समुन्दर
बनें
तो
बनें
आँसुओं
को
बहाना
ज़रूरी
नहीं
कौन
है
जो
तुम्हारी
कहानी
सुने
ग़म
सभी
को
दिखाना
ज़रूरी
नहीं
तुम
सफ़र
में
अकेले
चलोगे
यहाँ
साथ
देगा
ज़माना
ज़रूरी
नहीं
बर्क़
गिरती
रहेगी
चमन
में
मगर
ख़ाक
हो
आशियाना
ज़रूरी
नहीं
तीर
भी
अब
चलें
कुछ
नए
ढंग
से
चूक
जाए
निशाना
ज़रूरी
नहीं
हस्ब-ए-मामूल
उसने
है
वा'दा
किया
उसका
वा'दा
निभाना
ज़रूरी
नहीं
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Gulshan
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यानी
कोई
कमी
नहीं
मुझ
में
यानी
मुझ
में
कमी
उन्हीं
की
है
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बिखरने
सँवरने
को
जी
चाहता
है
कि
फिर
जीने
मरने
को
जी
चाहता
है
किया
आज
तक
जो
नहीं
ज़िन्दगी
में
वो
सब
कर
गुज़रने
को
जी
चाहता
है
किसी
की
निगाहों
की
गहराइयों
में
मेरा
भी
उतरने
को
जी
चाहता
है
लगे
फीकी
फीकी
सी
जो
ज़ीस्त
उस
में
नये
रंग
भरने
को
जी
चाहता
है
किसी
की
किए
बिन
कोई
फ़िक्र
'गुलशन'
करो
वो
जो
करने
को
जी
चाहता
है
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