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SHABAB ANWAR
na ho raah men koi aaft agar
na ho raah men koi aaft agar | न हो राह में कोई आफ़त अगर
- SHABAB ANWAR
न
हो
राह
में
कोई
आफ़त
अगर
तो
फिर
तुम
सही
रास्ते
पर
नहीं
क़दम
तो
बढ़ाना
पड़ेगा
तुम्हें
यहाँ
मिलता
कुछ
सोचने
पर
नहीं
- SHABAB ANWAR
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शायद
किसी
बला
का
था
साया
दरख़्त
पर
चिड़ियों
ने
रात
शोर
मचाया
दरख़्त
पर
Abbas Tabish
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मेरा
दस्तक
देना
इतना
अच्छा
लगता
है
उसको
दस्तक
देना
बंद
करूँँ
तो
दरवाज़ा
खुल
जाता
है
Vishnu virat
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दे
रहे
हैं
लोग
मेरे
दिल
पे
दस्तक
बार
बार
दिल
मगर
ये
कह
रहा
है
सिर्फ़
तू
और
सिर्फ़
तू
Fareeha Naqvi
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हम
किसी
दर
पे
न
ठिटके
न
कहीं
दस्तक
दी
सैकड़ों
दर
थे
मिरी
जाँ
तिरे
दर
से
पहले
Ibn E Insha
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जहाँ
पहुँच
के
क़दम
डगमगाए
हैं
सब
के
उसी
मक़ाम
से
अब
अपना
रास्ता
होगा
Aabid Adeeb
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इस
से
पहले
कि
बिछड़
जाएँ
हम
दो
क़दम
और
मिरे
साथ
चलो
मुझ
सा
फिर
कोई
न
आएगा
यहाँ
रोक
लो
मुझको
अगर
रोक
सको
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Nasir Kazmi
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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मैं
उस
सेे
दूर
था
तो
शोर
था
साजिश
है,
साजिश
है
उसे
बाहों
में
खुलकर
कस
लिया
दो
पल
तो
हंगामा
Kumar Vishwas
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दरवाज़े
पर
दस्तक
देने
से
पहले
मेरे
हाथ
दु'आ
में
ख़ुद
उठ
जाते
हैं
Tanoj Dadhich
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जो
कहा
मैंने
उसने
सुना
ही
नहीं
फ़ैसला
मेरे
हक़
में
हुआ
ही
नहीं
वैसे
तो
मिल
गई
सारी
चीज़ें
मुझे
जो
मगर
चाहिए
था
मिला
ही
नहीं
देख
कर
मुझको
उसने
छुपा
ली
नज़र
जैसे
उस
सेे
मिरा
राब्ता
ही
नहीं
उसने
दुनिया
लुटा
दी
मिरे
वास्ते
मैंने
उसके
लिए
कुछ
किया
ही
नहीं
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SHABAB ANWAR
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ऐसी
भी
कोई
शाम
हो
जिस
में
तू
हम-कलाम
हो
उकता
गया
सभी
से
मैं
कब
ज़िन्दगी
तमाम
हो
हो
नाम
बाद
मरने
के
सो
ऐसा
कोई
काम
हो
लानत
हो
ऐसे
काम
में
जो
धर्म
में
हराम
हो
दिन
गुज़रा
उसकी
याद
में
अब
शाम
तेरे
नाम
हो
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SHABAB ANWAR
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शाम
का
मंज़र
सुहाना
होता
है
तेरी
यादों
को
जो
आना
होता
है
करने
वाले
कर
गुज़रते
हैं
सभी
काहिलों
का
तो
बहाना
होता
है
ख़ामियाँ
फिर
कुछ
नज़र
आती
नहीं
कोई
बंदा
जब
दिवाना
होता
है
देख
ले
वो
मुस्कुरा
के
गर
कभी
दिल
में
ख़ुशियों
का
ठिकाना
होता
है
तेरा
अच्छा
वक़्त
है
तो
क्या
हुआ
दोस्त
'अनवर'
का
ज़माना
होता
है
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SHABAB ANWAR
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याद
तो
आएगा
वो
गुज़रा
ज़माना
जब
तिरे
दिल
में
था
बस
मेरा
ठिकाना
एक
सस्ती
शय
की
ख़ातिर
मुझको
छोड़ा
ग़ैर
की
चाहत
में
तू
इतना
दिवाना
जो
विरासत
में
मिली
तो
क्या
ही
जानो
कितना
मुश्किल
होता
है
इक
घर
बनाना
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SHABAB ANWAR
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जो
भी
माँगे
वो
तुझे
हासिल
हो
शक
दु'आ
में
न
अगर
शामिल
हो
छोड़िए
ख़र्च
ज़ियादा
करना
जब
कमाना
ही
हमें
मुश्किल
हो
बिन
कहे
मेरे
वो
सब
कुछ
समझे
इतना
इक
यार
मिरा
क़ाबिल
हो
जब
हो
बेचैन
कभी
दिल
तेरा
रब
के
घर
में
भी
कभी
दाख़िल
हो
कर
दु'आ
अपने
ख़ुदास
अनवर
कुछ
तो
अच्छा
तिरा
मुस्तक़बिल
हो
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SHABAB ANWAR
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