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Ammar Iqbal
isee fakeer ki gafalt se aagahi li hai
isee fakeer ki gafalt se aagahi li hai | इसी फ़कीर की गफ़लत से आगही ली है
- Ammar Iqbal
इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
- Ammar Iqbal
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अगर
बेदाग़
होता
चाँद
तो
अच्छा
नहीं
लगता
मोहब्बत
ख़ूब-सूरत
दाग़
है,
बेदाग़
से
दिल
पर
Umesh Maurya
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याद
रखना
ही
मोहब्बत
में
नहीं
है
सब
कुछ
भूल
जाना
भी
बड़ी
बात
हुआ
करती
है
Jamal Ehsani
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मुझे
पहले
पहल
लगता
था
ज़ाती
मसअला
है
मैं
फिर
समझा
मोहब्बत
क़ायनाती
मसअला
है
परिंदे
क़ैद
हैं
तुम
चहचहाहट
चाहते
हो
तुम्हें
तो
अच्छा
ख़ासा
नफ़सयाती
मसअला
है
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Umair Najmi
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मैं
सात
साल
से
अब
तक
हिसार-ए-इश्क़
में
हूँ
वो
शख़्स
आज
भी
मेरे
दिल-ओ-दिमाग़
में
है
Amaan Haider
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मोहब्बत
का
नहीं
इक
दिन
मुकर्रर
मोहब्बत
उम्रभर
का
सिलसिला
है
Neeraj Naveed
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होगा
किसी
दीवार
के
साए
में
पड़ा
'मीर'
क्या
रब्त
मोहब्बत
से
उस
आराम-तलब
को
Meer Taqi Meer
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शहर-वालों
की
मोहब्बत
का
मैं
क़ायल
हूँ
मगर
मैंने
जिस
हाथ
को
चूमा
वही
ख़ंजर
निकला
Ahmad Faraz
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मुहब्बत
में
हमने
सियासत
न
की
तभी
इश्क़
में
कोई
बरकत
न
की
उसे
मानता
था
मैं
अपना
ख़ुदा
कभी
उसकी
लेकिन
इबादत
न
की
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RAJAT AWASTHI
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अदब
वाले
अदब
की
महफ़िलें
पहचान
लेते
हैं
उन्हें
तुम
प्यार
से
कुछ
भी
कहो
वो
मान
लेते
हैं
जहाँ
तक
देख
सकते
हैं
वहाँ
तक
सुन
नहीं
सकते
मगर
जब
इश्क़
हो
जाए
तो
धड़कन
जान
लेते
हैं
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Hameed Sarwar Bahraichi
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इश्क़
को
पूछता
नहीं
कोई
हुस्न
का
एहतिराम
होता
है
Asrar Ul Haq Majaz
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मैंने
चाहा
था
ज़ख़्म
भर
जाएँ
ज़ख़्म
ही
ज़ख़्म
भर
गए
मुझ
में
Ammar Iqbal
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तख़य्युल
को
बरी
करने
लगा
हूँ
मैं
ज़ेहनी
ख़ुद-कुशी
करने
लगा
हूँ
मुझे
ज़िंदा
जलाया
जा
रहा
है
तो
क्या
मैं
रौशनी
करने
लगा
हूँ
मैं
आईनों
को
देखे
जा
रहा
था
अब
इन
से
बात
भी
करने
लगा
हूँ
तुम्हारी
बस
तुम्हारी
दुश्मनी
में
मैं
सब
से
दोस्ती
करने
लगा
हूँ
मुझे
गुमराह
करना
ग़ैर-मुमकिन
मैं
अपनी
पैरवी
करने
लगा
हूँ
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Ammar Iqbal
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जाओ
मातम
गुज़ारो
जाने
दो
जिस
का
ग़म
है
उसे
मनाने
दो
बीच
से
एक
दास्ताँ
टूटी
और
फिर
बन
गए
फ़साने
दो
हम
फ़क़ीरों
को
कुछ
तो
दो
साहब
कुछ
नहीं
दे
सको
तो
ता'ने
दो
हाथ
जिस
को
लगा
नहीं
सकता
उस
को
आवाज़
तो
लगाने
दो
तुम
दिया
हो
तो
उन
पतंगों
को
कम
से
कम
रौशनी
में
आने
दो
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Ammar Iqbal
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ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
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Ammar Iqbal
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यूँँही
बे-बाल-ओ-पर
खड़े
हुए
हैं
हम
क़फ़स
तोड़
कर
खड़े
हुए
हैं
दश्त
गुज़रा
है
मेरे
कमरे
से
और
दीवार-ओ-दर
खड़े
हुए
हैं
ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
और
कितनी
घुमाओगे
दुनिया
हम
तो
सर
थाम
कर
खड़े
हुए
हैं
बरगुज़ीदा
बुज़ुर्ग
नीम
के
पेड़
थक
गए
हैं
मगर
खड़े
हुए
हैं
मुद्दतों
से
हज़ार-हा
आलम
एक
उम्मीद
पर
खड़े
हुए
हैं
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Ammar Iqbal
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