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SHABAB ANWAR
aisi bhi koi shaam ho
aisi bhi koi shaam ho | ऐसी भी कोई शाम हो
- SHABAB ANWAR
ऐसी
भी
कोई
शाम
हो
जिस
में
तू
हम-कलाम
हो
उकता
गया
सभी
से
मैं
कब
ज़िन्दगी
तमाम
हो
हो
नाम
बाद
मरने
के
सो
ऐसा
कोई
काम
हो
लानत
हो
ऐसे
काम
में
जो
धर्म
में
हराम
हो
दिन
गुज़रा
उसकी
याद
में
अब
शाम
तेरे
नाम
हो
- SHABAB ANWAR
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी
में
गुज़री
हमारी
ज़िन्दगी
अब
तू
मुनासिब
सी
सज़ा
दे
गिनती
करके
Kartik tripathi
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हम
भी
क्या
ज़िंदगी
गुज़ार
गए
दिल
की
बाज़ी
लगा
के
हार
गए
Dagh Dehlvi
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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ज़िंदगी
और
चल
नहीं
सकती
आने
पे
मौत
टल
नहीं
सकती
Afzal Sultanpuri
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तुम्हारी
मौत
मेरी
ज़िंदगी
से
बेहतर
है
तुम
एक
बार
मरे
मैं
तो
बार
बार
मरा
Zubair Ali Tabish
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मैं
ने
आबाद
किए
कितने
ही
वीराने
'हफ़ीज़'
ज़िंदगी
मेरी
इक
उजड़ी
हुई
महफ़िल
ही
सही
Hafeez Banarasi
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जब
से
हुआ
है
कंधे
से
बस्ते
का
बोझ
कम
बढ़ते
ही
जा
रहे
हैं
मेरी
ज़िंदगी
में
ग़म
Ankit Maurya
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ज़िंदगी
एक
फ़न
है
लम्हों
को
अपने
अंदाज़
से
गँवाने
का
Jaun Elia
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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ये
दुनिया
मोहब्बत
बिना
कुछ
नहीं
मोहब्बत
वफ़ा
के
सिवा
कुछ
नहीं
बहुत
आरज़ू
थी
करे
गुफ़्तुगू
मगर
पास
था
जब
कहा
कुछ
नहीं
है
अफ़सोस
तुझको
मिरे
हाल
पर
तो
मेरे
लिए
क्यूँँ
किया
कुछ
नहीं
अगर
मुझको
तू
छोड़कर
जाता
है
तो
बिगड़ेगा
भी
क्या
मिरा
कुछ
नहीं
दु'आ
माँग
अनवर
कि
सब
कुछ
मिले
मगर
मुझको
होगा
अता
कुछ
नहीं
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SHABAB ANWAR
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उसकी
इतनी
हसीन
सूरत
है
देख
कर
चाँद
को
भी
हैरत
है
सादगी
में
जो
ख़ूब-सूरत
है
उसको
सजने
की
क्या
ज़रूरत
है
इक
ज़माना
हुआ
मिले
तुम
सेे
अब
तुम्हें
देखने
की
हसरत
है
प्यार
मुझको
यहाँ
मिले
कैसे
सबके
दिल
में
तो
बैठी
नफ़रत
है
एक
पल
मेरे
बिन
नहीं
रहती
उसकी
भी
ये
अजीब
फ़ितरत
है
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SHABAB ANWAR
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जिसके
होने
से
हो
सभी
ना-ख़ुश
मैं
वो
किरदार
हूँ
कहानी
में
SHABAB ANWAR
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न
हो
राह
में
कोई
आफ़त
अगर
तो
फिर
तुम
सही
रास्ते
पर
नहीं
क़दम
तो
बढ़ाना
पड़ेगा
तुम्हें
यहाँ
मिलता
कुछ
सोचने
पर
नहीं
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SHABAB ANWAR
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मुझको
कभी
अता
न
हो
जिस
इश्क़
में
वफ़ा
न
हो
हर
बात
तेरी
मानूँगा
बस
मुझ
सेे
तू
ख़फ़ा
न
हो
इक
ज़ख़्म
ऐसा
चाहिए
जिसकी
कोई
दवा
न
हो
इक
बार
मुझ
सेे
तुम
मिलो
और
फिर
कभी
जुदा
न
हो
बन
जाए
वो
फ़रिश्ता
ही
बंदा
अगर
बुरा
न
हो
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SHABAB ANWAR
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