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SHABAB ANWAR
ye duniya mohabbat bina kuchh nahin
ye duniya mohabbat bina kuchh nahin | ये दुनिया मोहब्बत बिना कुछ नहीं
- SHABAB ANWAR
ये
दुनिया
मोहब्बत
बिना
कुछ
नहीं
मोहब्बत
वफ़ा
के
सिवा
कुछ
नहीं
बहुत
आरज़ू
थी
करे
गुफ़्तुगू
मगर
पास
था
जब
कहा
कुछ
नहीं
है
अफ़सोस
तुझको
मिरे
हाल
पर
तो
मेरे
लिए
क्यूँँ
किया
कुछ
नहीं
अगर
मुझको
तू
छोड़कर
जाता
है
तो
बिगड़ेगा
भी
क्या
मिरा
कुछ
नहीं
दु'आ
माँग
अनवर
कि
सब
कुछ
मिले
मगर
मुझको
होगा
अता
कुछ
नहीं
- SHABAB ANWAR
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मिरी
आरज़ू
का
हासिल
तिरे
लब
की
मुस्कुराहट
हैं
क़ुबूल
मुझ
को
सब
ग़म
तिरी
इक
ख़ुशी
के
बदले
Kashif Adeeb Makanpuri
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हम
जानते
तो
इश्क़
न
करते
किसू
के
साथ
ले
जाते
दिल
को
ख़ाक
में
इस
आरज़ू
के
साथ
Meer Taqi Meer
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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मैं
चाहता
यही
था
सब
चाह
ख़त्म
हो
अब
फिर
चाहकर
तुम्हें
बदला
ये
ख़याल
मेरा
Abhay Aadiv
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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किसी
के
ज़ख़्म
पर
चाहत
से
पट्टी
कौन
बाँधेगा
अगर
बहनें
नहीं
होंगी
तो
राखी
कौन
बाँधेगा
Munawwar Rana
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कभी
चाहत
पे
शक
करते
हुए
ये
भी
नहीं
सोचा
तुम्हारे
साथ
क्यूँ
रहते
अगर
अच्छा
नहीं
लगता
Munawwar Rana
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याद
तो
आएगा
वो
गुज़रा
ज़माना
जब
तिरे
दिल
में
था
बस
मेरा
ठिकाना
एक
सस्ती
शय
की
ख़ातिर
मुझको
छोड़ा
ग़ैर
की
चाहत
में
तू
इतना
दिवाना
जो
विरासत
में
मिली
तो
क्या
ही
जानो
कितना
मुश्किल
होता
है
इक
घर
बनाना
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SHABAB ANWAR
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हो
गया
रुस्वा
वो
पहले
ही
इश्क़
में
सो
वफ़ा
भी
उसे
अब
जफ़ा
लगती
है
SHABAB ANWAR
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नसीब
अपना
किस
तरह
बनाएँ
हम
लकीरें
हाथ
की
किसे
दिखाएँ
हम
यही
तलब
है
हम
सेे
घर
के
लोगों
की
कहीं
से
रोज़
धन
कमा
के
लाएँ
हम
हमारे
बाप
ने
भी
कल
ये
कह
दिया
तुम्हारा
बोझ
कितना
और
उठाएँ
हम
जतन
इसी
के
वास्ते
है
कैसे
अब
गरीबी
के
चराग़
को
बुझाएँ
हम
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SHABAB ANWAR
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जो
कहा
मैंने
उसने
सुना
ही
नहीं
फ़ैसला
मेरे
हक़
में
हुआ
ही
नहीं
वैसे
तो
मिल
गई
सारी
चीज़ें
मुझे
जो
मगर
चाहिए
था
मिला
ही
नहीं
देख
कर
मुझको
उसने
छुपा
ली
नज़र
जैसे
उस
सेे
मिरा
राब्ता
ही
नहीं
उसने
दुनिया
लुटा
दी
मिरे
वास्ते
मैंने
उसके
लिए
कुछ
किया
ही
नहीं
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SHABAB ANWAR
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उसकी
इतनी
हसीन
सूरत
है
देख
कर
चाँद
को
भी
हैरत
है
सादगी
में
जो
ख़ूब-सूरत
है
उसको
सजने
की
क्या
ज़रूरत
है
इक
ज़माना
हुआ
मिले
तुम
सेे
अब
तुम्हें
देखने
की
हसरत
है
प्यार
मुझको
यहाँ
मिले
कैसे
सबके
दिल
में
तो
बैठी
नफ़रत
है
एक
पल
मेरे
बिन
नहीं
रहती
उसकी
भी
ये
अजीब
फ़ितरत
है
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SHABAB ANWAR
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