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SHABAB ANWAR
ho gaya rusva vo pahle hi ishq men
ho gaya rusva vo pahle hi ishq men | हो गया रुस्वा वो पहले ही इश्क़ में
- SHABAB ANWAR
हो
गया
रुस्वा
वो
पहले
ही
इश्क़
में
सो
वफ़ा
भी
उसे
अब
जफ़ा
लगती
है
- SHABAB ANWAR
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ऐसी
भी
कोई
शाम
हो
जिस
में
तू
हम-कलाम
हो
उकता
गया
सभी
से
मैं
कब
ज़िन्दगी
तमाम
हो
हो
नाम
बाद
मरने
के
सो
ऐसा
कोई
काम
हो
लानत
हो
ऐसे
काम
में
जो
धर्म
में
हराम
हो
दिन
गुज़रा
उसकी
याद
में
अब
शाम
तेरे
नाम
हो
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जो
कहा
मैंने
उसने
सुना
ही
नहीं
फ़ैसला
मेरे
हक़
में
हुआ
ही
नहीं
वैसे
तो
मिल
गई
सारी
चीज़ें
मुझे
जो
मगर
चाहिए
था
मिला
ही
नहीं
देख
कर
मुझको
उसने
छुपा
ली
नज़र
जैसे
उस
सेे
मिरा
राब्ता
ही
नहीं
उसने
दुनिया
लुटा
दी
मिरे
वास्ते
मैंने
उसके
लिए
कुछ
किया
ही
नहीं
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नसीब
अपना
किस
तरह
बनाएँ
हम
लकीरें
हाथ
की
किसे
दिखाएँ
हम
यही
तलब
है
हम
सेे
घर
के
लोगों
की
कहीं
से
रोज़
धन
कमा
के
लाएँ
हम
हमारे
बाप
ने
भी
कल
ये
कह
दिया
तुम्हारा
बोझ
कितना
और
उठाएँ
हम
जतन
इसी
के
वास्ते
है
कैसे
अब
गरीबी
के
चराग़
को
बुझाएँ
हम
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उसकी
इतनी
हसीन
सूरत
है
देख
कर
चाँद
को
भी
हैरत
है
सादगी
में
जो
ख़ूब-सूरत
है
उसको
सजने
की
क्या
ज़रूरत
है
इक
ज़माना
हुआ
मिले
तुम
सेे
अब
तुम्हें
देखने
की
हसरत
है
प्यार
मुझको
यहाँ
मिले
कैसे
सबके
दिल
में
तो
बैठी
नफ़रत
है
एक
पल
मेरे
बिन
नहीं
रहती
उसकी
भी
ये
अजीब
फ़ितरत
है
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याद
तो
आएगा
वो
गुज़रा
ज़माना
जब
तिरे
दिल
में
था
बस
मेरा
ठिकाना
एक
सस्ती
शय
की
ख़ातिर
मुझको
छोड़ा
ग़ैर
की
चाहत
में
तू
इतना
दिवाना
जो
विरासत
में
मिली
तो
क्या
ही
जानो
कितना
मुश्किल
होता
है
इक
घर
बनाना
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