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Pritam sihag
yuñ hi nahin lagaaya cigarette ko labon se
yuñ hi nahin lagaaya cigarette ko labon se | यूँँ ही नहीं लगाया सिगरेट को लबों से
- Pritam sihag
यूँँ
ही
नहीं
लगाया
सिगरेट
को
लबों
से
मैं
उसकी
सारी
यादें
सुलगाना
चाहता
हूँ
- Pritam sihag
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तो
क्या
ऐसे
ही
रोना
आ
गया
था
नहीं
वो
याद
लहजा
आ
गया
था
Shadab Javed
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अपनी
तन्हाई
मिरे
नाम
पे
आबाद
करे
कौन
होगा
जो
मुझे
उस
की
तरह
याद
करे
Parveen Shakir
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अब
तो
उन
की
याद
भी
आती
नहीं
कितनी
तन्हा
हो
गईं
तन्हाइयाँ
Firaq Gorakhpuri
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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जिस
रात
ख़ुद-कुशी
के
मुझे
आए
थे
ख़याल
उस
रात
मैंने
शे'र
कहे
और
सो
गया
Tanoj Dadhich
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तेरी
अंँगड़ाई
के
आलम
का
ख़याल
आया
जब
ज़ेहन-ए-वीरांँ
में
खनकने
लगे
कंगन
कितने
Shashank Shekhar Pathak
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ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
Adil Mansuri
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ज़रूरत
सब
कराती
है
मोहब्बत
भी
इबादत
भी
नहीं
तो
कौन
बेमतलब
किसी
को
याद
करता
है
Umesh Maurya
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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बुरे
हालात
है
तो
क्या
हुआ
इंसान
अच्छा
हूँ
सभी
रहते
यहाँ
मुझ
सेे
खफ़ा
इंसान
अच्छा
हूँ
ये
मेरी
जेब
में
जब
तक
अमीरी
की
निशानी
थी
मुझे
सारा
ज़माना
कहता
था
,
इंसान
अच्छा
हूँ
मैं
तेरी
बे-वफ़ाई
के
सभी
क़िस्सों
से
वाक़िफ़
हूँ
मैंने
फिर
भी
रखी
तुम
सेे
वफ़ा
,इंसान
अच्छा
हूँ
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Pritam sihag
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किसी
पर
आया
नहीं
ये
दिल
हमारा
फूलों
का
शौक़ीन
है
क़ातिल
हमारा
अब
तो
इस
सागर
में
डूबेगी
ये
कश्ती
यार
पीछे
रह
गया
साहिल
हमारा
वो
जुदा
होने
का
कहकर
हट
गई
थी
क्या
बताऊँ
जीना
है
मुश्किल
हमारा
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Pritam sihag
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अरे
ख़ुद-कुशी
करने
वाले
ज़रा
रुक
वतन
पर
मरो
ऐसे
क्या
मर
रहे
हो
Pritam sihag
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तेरे
बग़ैर
मेरा
अफ़्साना
चाहता
हूँ
या'नी
कि
ज़िंदगी
में
वीराना
चाहता
हूँ
यूँँ
ही
नहीं
लगाया
सिगरेट
को
लबों
से
मैं
उसकी
सारी
यादें
सुलगाना
चाहता
हूँ
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Pritam sihag
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जानते
हो
तुम
सच्चे
इश्क़
की
रवानी
क्या
मरने
भर
से
पूरी
हो
जाती
है
कहानी
क्या
मेरी
इन
सफलताओं
से
उदास
हैं
वो
सब
उनको
ये
नहीं
दिखती
काँटों
की
निशानी
क्या
क्यूँँ
उदास
रहते
हो
साफ़
साफ़
कह
दो
ये
अबकी
बार
भी
वो
बातें
नहीं
निभानी
क्या
अपने
प्यारे
से
क्यूँँ
तुम
सारे
दिन
झगड़ते
हो
आपको
ये
कश्ती
तट
पर
नहीं
लगानी
क्या
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Pritam sihag
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