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Pritam sihag
kisi par aaya nahin ye dil hamaara
kisi par aaya nahin ye dil hamaara | किसी पर आया नहीं ये दिल हमारा
- Pritam sihag
किसी
पर
आया
नहीं
ये
दिल
हमारा
फूलों
का
शौक़ीन
है
क़ातिल
हमारा
अब
तो
इस
सागर
में
डूबेगी
ये
कश्ती
यार
पीछे
रह
गया
साहिल
हमारा
वो
जुदा
होने
का
कहकर
हट
गई
थी
क्या
बताऊँ
जीना
है
मुश्किल
हमारा
- Pritam sihag
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अपनी
बाँहो
से
क्यूँँ
हटाऊँ
उसे
सो
रहा
है
तो
क्यूँँ
जगाऊँ
उसे
जो
भी
मिलता
है
उसका
पूछता
है
यार
किस
किस
से
मैं
छुपाऊँ
उसे
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Kafeel Rana
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कभी
अल्लाह
मियाँ
पूछेंगे
तब
उनको
बताएँगे
किसी
को
क्यूँ
बताएँ
हम
इबादत
क्यूँ
नहीं
करते
Farhat Ehsaas
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और
फिर
लोग
यही
कहते
फिरेंगे
इक
दिन
यार
कल
ही
तो
मेरी
बात
हुई
थी
उस
सेे
Saad Ahmad
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तिलिस्म-ए-यार
ये
पहलू
निकाल
लेता
है
कि
पत्थरों
से
भी
ख़ुशबू
निकाल
लेता
है
है
बे-लिहाज़
कुछ
ऐसा
की
आँख
लगते
ही
वो
सर
के
नीचे
से
बाजू
निकाल
लेता
है
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Tehzeeb Hafi
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बात
से
बात
बनेगी
तू
कभी
बात
तो
कर
आ
ज़रा
पास
मिरे
यार
मुलाक़ात
तो
कर
पूछ
तू
भी
तो
कभी
हाल
हमारे
दिल
का
हाल
से
हाल
मिलाने
की
शुरूआत
तो
कर
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shaan manral
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यार
भी
राह
की
दीवार
समझते
हैं
मुझे
मैं
समझता
था
मेरे
यार
समझते
हैं
मुझे
Shahid Zaki
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तनक़ीद
न
तक़रार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
हैरत
है
मेरे
यार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
गूँगों
को
तकल्लुक़
के
मवाक़े
हैं
मुयस्सर
हम
माहिर-ए-गुफ़्तार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
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Ahmad Abdullah
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उनके
गेसू
खुलें
तो
यार
बने
बात
मेरी
इक
रबर
बैंड
ने
जकड़ी
हुई
है
रात
मेरी
Zubair Ali Tabish
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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पहले
रूठा
यार
मनाना
होता
है
फिर
कोई
त्योहार
मनाना
होता
है
Hasan Raqim
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चाहे
जितना
भी
ख़फ़ा
होऊँ
मैं
तुम
सेे
लेकिन
मिट्टी
की
प्यास
पे
बादल
ये
बरस
जाता
है
Pritam sihag
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ये
सोचा
था
ग़रीबी
को
किताबों
से
मिटाऊँगा
न
था
मालूम
मैं
भूखा
किताबें
ही
खा
जाऊँगा
मिरे
कंधों
पे
घर
का
बोझ
आता
जा
रहा
है
अब
मैं
अब
ख़्वाबों
को
बाहर
का
ही
रास्ता
तो
दिखाऊंँगा
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Pritam sihag
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जानते
हो
तुम
सच्चे
इश्क़
की
रवानी
क्या
मरने
भर
से
पूरी
हो
जाती
है
कहानी
क्या
Pritam sihag
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मैं
किसी
दिन
दूर
कर
दूँगा
उसे
अय्यारी
से
उड़ती
हैं
कटकर
पतंगे
अपनी
ही
आजादी
से
इश्क़
में
ढेरों
ग़ज़ल
मैंने
लिखी
महबूब
पर
अब
दिखा
दूँ
सारी
की
सारी
मगर
हुश्यारी
से
घोर
अंधेरें
में
इक
गुमनाम
दीपक
सा
हूँ
मैं
इक
अजब
सी
रौशनी
फैलेगी
इस
ख़ामोशी
से
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Pritam sihag
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ये
तुम
रोज़
किस
दरिया
में
बह
रहे
हो
ये
दिल
ख़ाली
है,
तुम
कहाँ
रह
रहे
हो
ये
मैं
हूँ
कि
ग़म
में
लिखे
जा
रहा
हूँ
वो
कहते
हैं
अच्छी
ग़ज़ल
कह
रहे
हो
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Pritam sihag
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