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Pritam sihag
ye tum roz kis dariyaa men bah rahe ho
ye tum roz kis dariyaa men bah rahe ho | ये तुम रोज़ किस दरिया में बह रहे हो
- Pritam sihag
ये
तुम
रोज़
किस
दरिया
में
बह
रहे
हो
ये
दिल
ख़ाली
है,
तुम
कहाँ
रह
रहे
हो
ये
मैं
हूँ
कि
ग़म
में
लिखे
जा
रहा
हूँ
वो
कहते
हैं
अच्छी
ग़ज़ल
कह
रहे
हो
- Pritam sihag
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जानते
हो
तुम
सच्चे
इश्क़
की
रवानी
क्या
मरने
भर
से
पूरी
हो
जाती
है
कहानी
क्या
मेरी
इन
सफलताओं
से
उदास
हैं
वो
सब
उनको
ये
नहीं
दिखती
काँटों
की
निशानी
क्या
क्यूँँ
उदास
रहते
हो
साफ़
साफ़
कह
दो
ये
अबकी
बार
भी
वो
बातें
नहीं
निभानी
क्या
अपने
प्यारे
से
क्यूँँ
तुम
सारे
दिन
झगड़ते
हो
आपको
ये
कश्ती
तट
पर
नहीं
लगानी
क्या
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मैं
किसी
दिन
दूर
कर
दूँगा
उसे
अय्यारी
से
उड़ती
हैं
कटकर
पतंगे
अपनी
ही
आजादी
से
इश्क़
में
ढेरों
ग़ज़ल
मैंने
लिखी
महबूब
पर
अब
दिखा
दूँ
सारी
की
सारी
मगर
हुश्यारी
से
घोर
अंधेरें
में
इक
गुमनाम
दीपक
सा
हूँ
मैं
इक
अजब
सी
रौशनी
फैलेगी
इस
ख़ामोशी
से
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यूँँ
तो
लिख
लूँगा
अपने
आप
ही
मेरी
कहानी
मैं
हो
इन
में
नाम
गर
अपनों
के
भी
शामिल
तो
क्या
होता
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किसी
पर
आया
नहीं
ये
दिल
हमारा
फूलों
का
शौक़ीन
है
क़ातिल
हमारा
अब
तो
इस
सागर
में
डूबेगी
ये
कश्ती
यार
पीछे
रह
गया
साहिल
हमारा
वो
जुदा
होने
का
कहकर
हट
गई
थी
क्या
बताऊँ
जीना
है
मुश्किल
हमारा
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ये
सोचा
था
ग़रीबी
को
किताबों
से
मिटाऊँगा
न
था
मालूम
मैं
भूखा
किताबें
ही
खा
जाऊँगा
मिरे
कंधों
पे
घर
का
बोझ
आता
जा
रहा
है
अब
मैं
अब
ख़्वाबों
को
बाहर
का
ही
रास्ता
तो
दिखाऊंँगा
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