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Pritam sihag
jaante ho tum sacche ishq ki ravaani kya
jaante ho tum sacche ishq ki ravaani kya | जानते हो तुम सच्चे इश्क़ की रवानी क्या
- Pritam sihag
जानते
हो
तुम
सच्चे
इश्क़
की
रवानी
क्या
मरने
भर
से
पूरी
हो
जाती
है
कहानी
क्या
मेरी
इन
सफलताओं
से
उदास
हैं
वो
सब
उनको
ये
नहीं
दिखती
काँटों
की
निशानी
क्या
क्यूँँ
उदास
रहते
हो
साफ़
साफ़
कह
दो
ये
अबकी
बार
भी
वो
बातें
नहीं
निभानी
क्या
अपने
प्यारे
से
क्यूँँ
तुम
सारे
दिन
झगड़ते
हो
आपको
ये
कश्ती
तट
पर
नहीं
लगानी
क्या
- Pritam sihag
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इश्क़
से
तबीअत
ने
ज़ीस्त
का
मज़ा
पाया
दर्द
की
दवा
पाई
दर्द-ए-बे-दवा
पाया
Mirza Ghalib
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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अगर
तुम
हो
तो
घबराने
की
कोई
बात
थोड़ी
है
ज़रा
सी
बूँदा-बाँदी
है
बहुत
बरसात
थोड़ी
है
ये
राह-ए-इश्क़
है
इस
में
क़दम
ऐसे
ही
उठते
हैं
मोहब्बत
सोचने
वालों
के
बस
की
बात
थोड़ी
है
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Abrar Kashif
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इश्क़
में
जी
को
सब्र
ओ
ताब
कहाँ
उस
से
आँखें
लड़ीं
तो
ख़्वाब
कहाँ
Meer Taqi Meer
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हर
गाम
तेरे
इश्क़
का
इकरार
है
मैं
हूँ
ज़ंजीर
है
ज़ंजीर
की
झनकार
है
मैं
हूँ
ऐ
ज़ीस्त
जो
सब
सेे
बड़ी
फ़नकार
है
तू
है
और
तुझ
सेे
बड़ा
वो
जो
अदाकार
है
मैं
हूँ
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Obaid Azam Azmi
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हुस्न
को
शर्मसार
करना
ही
इश्क़
का
इंतिक़ाम
होता
है
Asrar Ul Haq Majaz
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वा'दा
करो
कि
हाथ
छुड़ाकर
न
जाओगे
वा'दा
करो
कि
सात
जनम
तक
रहेगा
इश्क़
Mukesh Jha
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सर्दी
और
गर्मी
के
उज़्र
नहीं
चलते
मौसम
देख
के
साहब
इश्क़
नहीं
होता
Moin Shadab
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इश्क़
भी
अपनी
ही
शर्तों
पे
किया
है
मैं
ने
ख़ुद
को
बेचा
नहीं
बाज़ार
में
सस्ता
करके
उस
से
कहना
था
के
वो
कितना
ज़रूरी
है
मुझे
आ
रहा
हूँ
अभी
जिस
शख़्स
से
झगड़ा
करके
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Khan Janbaz
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यूँँ
ही
नहीं
लगाया
सिगरेट
को
लबों
से
मैं
उसकी
सारी
यादें
सुलगाना
चाहता
हूँ
Pritam sihag
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यूँँ
तो
लिख
लूँगा
अपने
आप
ही
मेरी
कहानी
मैं
हो
इन
में
नाम
गर
अपनों
के
भी
शामिल
तो
क्या
होता
Pritam sihag
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संसार
को
बेहद
ज़ालिम
जान
लिया
मैंने
फिर
उस
सेे
मिला
हाथों
को
चूम
दिया
मैंने
जो
उसने
किताब-ए-ग़म
तोहफ़े
में
मुझे
दी
थी
इक
पन्ना
ये
याद-ए-रफ़्ता
चूम
लिया
मैंने
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Pritam sihag
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बुरे
हालात
है
तो
क्या
हुआ
इंसान
अच्छा
हूँ
सभी
रहते
यहाँ
मुझ
सेे
खफ़ा
इंसान
अच्छा
हूँ
ये
मेरी
जेब
में
जब
तक
अमीरी
की
निशानी
थी
मुझे
सारा
ज़माना
कहता
था
,
इंसान
अच्छा
हूँ
मैं
तेरी
बे-वफ़ाई
के
सभी
क़िस्सों
से
वाक़िफ़
हूँ
मैंने
फिर
भी
रखी
तुम
सेे
वफ़ा
,इंसान
अच्छा
हूँ
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Pritam sihag
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तेरे
बग़ैर
मेरा
अफ़्साना
चाहता
हूँ
या'नी
कि
ज़िंदगी
में
वीराना
चाहता
हूँ
यूँँ
ही
नहीं
लगाया
सिगरेट
को
लबों
से
मैं
उसकी
सारी
यादें
सुलगाना
चाहता
हूँ
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Pritam sihag
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