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Dileep Kumar
jinhen be-hisi ka zara bhi pata nain
jinhen be-hisi ka zara bhi pata nain | जिन्हें बे-हिसी का ज़रा भी पता नइँ
- Dileep Kumar
जिन्हें
बे-हिसी
का
ज़रा
भी
पता
नइँ
उन्हें
ज़िंदगी
का
ज़रा
भी
पता
नइँ
मिरी
दोस्ती
की
हदें
जानता
है
मिरी
दुश्मनी
का
ज़रा
भी
पता
नइँ
मोहब्बत
में
कान्हा
तो
तुम
बन
गए
हो
मगर
रुक्मणी
का
ज़रा
भी
पता
नइँ
- Dileep Kumar
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दुकानें
नफ़रतों
की
ख़ूब
आसानी
से
चलती
हैं
अजब
दुनिया
है
जाने
इश्क़
क्यूँ
करने
नहीं
देती
Bhaskar Shukla
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प्यार-मोहब्बत
सीधे-सादे
रस्ते
हैं
कोई
इन
पर
चलने
को
तैयार
नहीं
Ashok Rawat
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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सुने
हैं
मोहब्बत
के
चर्चे
बहुत
सुना
है
कि
हैं
इस
में
ख़र्चे
बहुत
नतीजे
मोहब्बत
के
आए
नहीं
भरे
थे
मगर
हम
ने
पर्चे
बहुत
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S M Afzal Imam
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जनाज़े
पर
मेरे
लिख
देना
यारों
मोहब्बत
करने
वाला
जा
रहा
है
Rahat Indori
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मुझे
पहले
पहल
लगता
था
ज़ाती
मसअला
है
मैं
फिर
समझा
मोहब्बत
क़ायनाती
मसअला
है
परिंदे
क़ैद
हैं
तुम
चहचहाहट
चाहते
हो
तुम्हें
तो
अच्छा
ख़ासा
नफ़सयाती
मसअला
है
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Umair Najmi
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मोहब्बत
करने
वाले
कम
न
होंगे
तिरी
महफ़िल
में
लेकिन
हम
न
होंगे
Hafeez Hoshiarpuri
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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अगर
बेदाग़
होता
चाँद
तो
अच्छा
नहीं
लगता
मोहब्बत
ख़ूब-सूरत
दाग़
है,
बेदाग़
से
दिल
पर
Umesh Maurya
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मिलता
नहीं
जहाँ
में
कोई
काम
ढंग
का
इक
इश्क़
था
सो
वो
भी
कई
बार
कर
चुके
Nomaan Shauque
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हर
किसी
को
याद
दिलबर
की
सताए
कोई
रोना
चाहे
तो
रो
भी
न
पाए
महज़
इक
उस
शख़्स
की
ख़ातिर
मैं
ने
यार
जाने
अनजाने
में
कितने
दिल
दुखाए
शे'र
अपने
तो
सुनाते
हैं
सभी
ही
कोई
हो
जो
मीर
की
ग़ज़लें
सुनाए
दास्ताँ
ही
जब
अधूरी
है
किसी
की
फिर
तुझे
वो
क्या
बताए
क्या
छुपाए
इश्क़
से
कुछ
यूँँ
भरोसा
उठ
गया
है
और
कोई
भी
न
अब
इस
दिल
को
भाए
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Dileep Kumar
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ग़ुरूर
भी
बहुत
हैं
और
दिलकशी
नहीं
रही
तिरे
बिना
ये
ज़िंदगी
भी
ज़िंदगी
नहीं
रही
मिलें
हैं
आज
तीन-चार
साल
बाद
हम
कहीं
मगर
लबों
पे
उस
के
वो
शिकस्तगी
नहीं
रही
सभी
ही
तोड़ते
रहे
किसी
तरह
से
दिल
मिरा
मगर
मिरी
किसी
से
बे-त'अल्लुक़ी
नहीं
रही
ये
एक
शख़्स
का
मलाल
सीख
दे
गया
मुझे
जहाँ
में
अब
'दिलीप'
आदमी-गरी
नहीं
रही
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Dileep Kumar
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जिस
किसी
से
तेरा
चक्कर
चल
रहा
था
उसको
मैं
अच्छी
तरह
से
जानता
था
रातें
रौशन
थी
किसी
की
तुझ
सेे
दिलबर
तो
किसी
का
तेरे
बा'इस
रत-जगा
था
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Dileep Kumar
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इक
आदमी
भी
जब
नहीं
राज़ी
लतीफ़ों
के
लिए
फिर
तो
बचा
ही
कुछ
नहीं
हैं
हम
दरख़्तों
के
लिए
जो
ज़हर
फैलाने
लगी
है
हर
तरफ़
से
हर
कहीं
कोई
दवा
है
तो
बताओ
उन
हवाओं
के
लिए
किस
बात
पर
तुम
ने
भरोसा
कर
लिया
उस
शख़्स
का
मशहूर
है
जो
शहर
भर
में
बस
फ़सानों
के
लिए
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Dileep Kumar
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क्या
सितम
है
तुम
पे
ग़ज़लें
लिख
रहें
हैं
हमको
ये
दुख
तो
कभी
लिखना
नहीं
था
Dileep Kumar
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