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Dileep Kumar
ghuroor bhi bahut hain aur dilkashi nahin rahi
ghuroor bhi bahut hain aur dilkashi nahin rahi | ग़ुरूर भी बहुत हैं और दिलकशी नहीं रही
- Dileep Kumar
ग़ुरूर
भी
बहुत
हैं
और
दिलकशी
नहीं
रही
तिरे
बिना
ये
ज़िंदगी
भी
ज़िंदगी
नहीं
रही
मिलें
हैं
आज
तीन-चार
साल
बाद
हम
कहीं
मगर
लबों
पे
उस
के
वो
शिकस्तगी
नहीं
रही
सभी
ही
तोड़ते
रहे
किसी
तरह
से
दिल
मिरा
मगर
मिरी
किसी
से
बे-त'अल्लुक़ी
नहीं
रही
ये
एक
शख़्स
का
मलाल
सीख
दे
गया
मुझे
जहाँ
में
अब
'दिलीप'
आदमी-गरी
नहीं
रही
- Dileep Kumar
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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ये
हुनर
रब
ने
मेरी
ज़ात
में
रक्खा
हुआ
है
अच्छे
अच्छो
को
भी
औक़ात
में
रक्खा
हुआ
है
Fareeha Naqvi
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लिक्खा
गया
न
कुछ
कभी
मुझ
सेे
जवाब
में
रक्खा
ही
रह
गया
है
तेरा
ख़त
किताब
में
Ankit Maurya
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दर्द
सहने
का
हुनर
तो
पास
सबके
है
मगर
दर्द
कहने
का
हुनर
बस
शायरों
के
पास
है
Divy Kamaldhwaj
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हर
किसी
से
ही
मुहब्बत
माँगता
है
दिल
तो
अब
सब
सेे
अक़ीदत
माँगता
है
सीख
आया
है
सलीक़ा
ग़ुफ़्तगू
का
मुझ
सेे
मेरा
दोस्त
इज़्ज़त
माँगता
है
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तमाम
होश
ज़ब्त
इल्म
मस्लहत
के
बाद
भी
फिर
इक
ख़ता
मैं
कर
गया
था
माज़रत
के
बाद
भी
Pallav Mishra
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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क़ौम-ओ-मज़हब
क्या
किसी
का
और
क्या
है
रंग-ओ-नस्ल
ऐसी
बातें
छोड़
कर
बस
इल्म-ओ-फ़न
की
बात
हो
Sayan quraishi
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किताबें
बंद
करके
जब
मैं
बिस्तर
पर
पहुँचता
हूँ
तुम्हारी
याद
भी
आकर
बगल
में
लेट
जाती
है
Bhaskar Shukla
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मुझको
वो
इतना
बे-ज़ार
कर
देता
है
मेरा
जीना
भी
दुश्वार
कर
देता
है
जिस
तरह
हँस
के
मिलता
है
हर
एक
से
मुझको
भी
वो
मिलन-सार
कर
देता
है
वो
जो
मुमकिन
नहीं
है
कहानी
से
भी
काम
वो
एक
किरदार
कर
देता
है
घर
हो
जाते
हैं
मिसमार
इस
से
मगर
इक
ग़लत
दाँव
बेदार
कर
देता
है
इश्क़
कुछ
भी
नहीं
इक
मरज़
के
सिवा
अच्छे
अच्छों
को
बीमार
कर
देता
है
बोती
थी
पहले
नफ़रत
सियासत,
मगर
अब
ये
भी
काम
अख़बार
कर
देता
है
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Dileep Kumar
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वहीं
रिश्ते
खरे
मालूम
होते
हैं
ज़रा
सी
भूल
से
जो
टूट
जाते
हैं
Dileep Kumar
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दिखने
में
जो
अहल-ए-दिल
होते
हैं
तेरी
महफ़िल
में
शामिल
होते
हैं
कुछ
को
इल्म-ए-ख़ुदा
भी
होता
है
और
कुछ
हम
जैसे
भी
जाहिल
होते
हैं
उनका
रस्तों
से
क्या
लेना
देना
जो
सब
के
ख़िज़्र-ए-मन्ज़िल
होते
हैं
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Dileep Kumar
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यूँँ
तो
हर
एक
से
ही
राब्ते
रक्खे
मगर
मुझ
सेे
मिला
तो
फ़ासले
रक्खे
मुहब्बत
जितनी
भी
थी
बस
तुझी
से
थी
किसी
से
फिर
न
कोई
सिलसिले
रक्खे
तिरे
रहम-ओ-करम
से
ही
मिले
सब
ज़ख़्म
मिरे
सब
ज़ख़्म
तू
ने
ही
हरे
रक्खे
ग़ज़ल
के
क़ाफ़िए
बदले,
ग़ज़ल
बदली
ग़ज़ल
के
फिर
म'आनी
भी
नए
रक्खे
न
थी
उम्मीद
उसके
लौट
आने
की
मगर
दरवाजे
सारे
ही
खुले
रक्खे
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Dileep Kumar
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एक
तो
कुछ
भी
कहा
जाता
नहीं
और
फिर
चुप
भी
रहा
जाता
नहीं
इसलिए
भी
माफ़
कर
देता
है
वो
दरमियाँ
कुछ
हो,
सहा
जाता
नहीं
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Dileep Kumar
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