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Dileep Kumar
dikhne men jo ahl-e-dil hote hain
dikhne men jo ahl-e-dil hote hain | दिखने में जो अहल-ए-दिल होते हैं
- Dileep Kumar
दिखने
में
जो
अहल-ए-दिल
होते
हैं
तेरी
महफ़िल
में
शामिल
होते
हैं
कुछ
को
इल्म-ए-ख़ुदा
भी
होता
है
और
कुछ
हम
जैसे
भी
जाहिल
होते
हैं
उनका
रस्तों
से
क्या
लेना
देना
जो
सब
के
ख़िज़्र-ए-मन्ज़िल
होते
हैं
- Dileep Kumar
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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मैं
ने
आबाद
किए
कितने
ही
वीराने
'हफ़ीज़'
ज़िंदगी
मेरी
इक
उजड़ी
हुई
महफ़िल
ही
सही
Hafeez Banarasi
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दर्द
की
बात
किसी
हँसती
हुई
महफ़िल
में
जैसे
कह
दे
किसी
तुर्बत
पे
लतीफ़ा
कोई
Ahmad Rahi
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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बात
करनी
मुझे
मुश्किल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
जैसी
अब
है
तेरी
महफ़िल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
Bahadur Shah Zafar
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महफ़िल
में
बैठे
लोगों
को
भाने
लगी
जब
वो
मेरे
अश'आर
फ़रमाने
लगी
Rachit Sonkar
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ये
गूँगों
की
महफ़िल
है
निकलना
ही
पड़ेगा
क्या
इतनी
ख़ता
कम
है
कि
हम
बोल
पड़े
हैं
Waseem Barelvi
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अगर
लगता
है
वो
क़ाबिल
नहीं
है
तो
रिश्ता
तोड़ना
मुश्किल
नहीं
है
रक़ीब
आया
है
मेरे
शे'र
सुनने
तो
अब
ये
जंग
है
महफ़िल
नहीं
है
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Tanoj Dadhich
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पहले-पहल
तो
लड़
लिए
अल्लाह
से
मगर
अब
पेश
आ
रहे
हैं
बड़ी
आजिज़ी
से
हम
Amaan Pathan
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कोई
इक
भी
जब
न
मेहमाँ
पाया
हमने
फिर
तो
अपना
घर
ही
वीराँ
पाया
हमने
यूँँ
लगा
जैसे
बिछड़
के
ख़ुश
बहुत
हैं
देखा
तो
ख़ुद
को
पशेमाँ
पाया
हमने
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Dileep Kumar
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वो
दुनिया
से
बिलकुल
जुदा
देखते
हैं
जो
कम-ज़र्फ़
में
हौसला
देखते
हैं
Dileep Kumar
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फ़ाइदा
कुछ
भी
न
होना
ख़ामुशी
से
मसअला
हल
होना
हैं
तो
दोस्ती
से
साथ
भी
उसका
निभाना
चाहता
हूँ
भागता
हूँ
दूर
भी
लेकिन
उसी
से
बज़्म
में
रस्मन
बुला
लेते
हैं
वरना
हैं
किसे
मतलब
मिरी
मौजूदगी
से
मसअला
सारा
ख़ुशी
का
है
वगरना
हो
ही
जाता
है
गुज़ारा
दूसरी
से
हश्र
क्या
होगा
न
जाने
इस
जहाँ
का
हैं
परेशाँ
आदमी
ही
आदमी
से
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Dileep Kumar
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जब
जब
ये
दिल
बंजर
कम
लगता
है
मुझको
अपना
ही
घर
कम
लगता
है
जब
से
मैं
ने
तेरी
आँखें
देखी
मुझको
तेरा
पैकर
कम
लगता
है
हर
इक
को
रस्ता
समझाने
वाले
तू
सब
को
ही
रहबर
कम
लगता
है
मुख़्बर
का
इक
ये
भी
फ़न
होता
है
मुख़्बर
सबको
मुख़्बर
कम
लगता
है
अपने
अफ़साने
शाबाशी
लूटे
हम-सर
का
हर
मंज़र
कम
लगता
है
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Dileep Kumar
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एक
तो
कुछ
भी
कहा
जाता
नहीं
और
फिर
चुप
भी
रहा
जाता
नहीं
इसलिए
भी
माफ़
कर
देता
है
वो
दरमियाँ
कुछ
हो,
सहा
जाता
नहीं
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Dileep Kumar
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