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Dileep Kumar
ik aadmi bhi jab nahin raazi lateefon ke li.e
ik aadmi bhi jab nahin raazi lateefon ke li.e | इक आदमी भी जब नहीं राज़ी लतीफ़ों के लिए
- Dileep Kumar
इक
आदमी
भी
जब
नहीं
राज़ी
लतीफ़ों
के
लिए
फिर
तो
बचा
ही
कुछ
नहीं
हैं
हम
दरख़्तों
के
लिए
जो
ज़हर
फैलाने
लगी
है
हर
तरफ़
से
हर
कहीं
कोई
दवा
है
तो
बताओ
उन
हवाओं
के
लिए
किस
बात
पर
तुम
ने
भरोसा
कर
लिया
उस
शख़्स
का
मशहूर
है
जो
शहर
भर
में
बस
फ़सानों
के
लिए
- Dileep Kumar
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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हवा
जब
चली
फड़फड़ा
कर
उड़े
परिंदे
पुराने
महल्लात
के
Muneer Niyazi
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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आग
अपने
ही
लगा
सकते
हैं
ग़ैर
तो
सिर्फ़
हवा
देते
हैं
Mohammad Alvi
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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क्यूँ
परेशाँ
हो
अब
सवालों
पे
धूल
तो
आ
गई
है
बालों
पे
हैं
रकीबों
के
तोहफ़े
साहब
दाँतों
के
सब
निशान
गालों
पे
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A R Sahil "Aleeg"
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बेहतर
है
मेरे
जाम
में
अब
ज़हर
मिला
दो
तुम
यूँँ
तो
मेरी
प्यास
को
कम
कर
नहीं
सकते
Saad Zaigham
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कमरे
में
फैलता
रहा
सिगरेट
का
धुआँ
मैं
बंद
खिड़कियों
की
तरफ़
देखता
रहा
Kafeel Aazar Amrohvi
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वक़्त
किस
तेज़ी
से
गुज़रा
रोज़-मर्रा
में
'मुनीर'
आज
कल
होता
गया
और
दिन
हवा
होते
गए
Muneer Niyazi
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सुखा
ली
सबने
ही
आँखें
हवा
ए
ज़िन्दगी
से
यहाँ
अब
भी
वही
रोना
रुलाना
चल
रहा
है
Farhat Ehsaas
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बन
जाते
हैं
जुगनू
अपने
दोस्त
सभी
हैं
दिल-जू
अपने
कोई
भी
साथ
नहीं
हो
तब
बहने
देना
आँसू
अपने
हो
जाते
हैं
बे-क़ाबू
हम
खोलो
ना
यूँँ
गेसू
अपने
मरना
मुश्किल
है
लेकिन
ये
ज़ीस्त
कहाँ
है
क़ाबू
अपने
उसको
भाते
पर
सीरत
से
आती
है
अब
बदबू
अपने
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Dileep Kumar
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दूर
साए
से
मेरे
कहीं
रहती
हो
या'नी
इस
शहर
में
अब
नहीं
रहती
हो
लौट
आया
हूँ
इक
दोस्त
के
घर
से
मैं
जब
ये
देखा
कि
तुम
भी
वहीं
रहती
हो
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Dileep Kumar
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ये
ज़माना
भी
इसी
बा'इस
तिरा
है
झूठ
भी
सच
की
तरह
तू
बोलता
है
Dileep Kumar
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छोड़
ये
सब,
यूँँ
न
आशुफ़्ता
हो
तू
तो
ज़िंदगी
जब
तक
है,
हम
चलते
रहेंगे
Dileep Kumar
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रोज़
थोड़ा
बहुत
ग़म
कमाते
रहे
फिर
उसी
को
कमाई
बताते
रहे
इश्क़
करते
रहे
उम्र
भर
और
फिर
उम्र
भर
इश्क़
से
खौफ़
खाते
रहे
और
कुछ
साफ़
किरदार
के
लोग
ही
देश
में
बस्तियों
को
जलाते
रहे
होश
में
आ
न
जाऊँ
कहीं
इस
लिए
जाम
पे
जाम
मुझ
को
पिलाते
रहे
जाननी
थी
सभी
को
कहानी
मिरी
हम
मगर
इक
फ़साना
सुनाते
रहे
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Dileep Kumar
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