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Dileep Kumar
jis kisi se teraa chakkar chal raha tha
jis kisi se teraa chakkar chal raha tha | जिस किसी से तेरा चक्कर चल रहा था
- Dileep Kumar
जिस
किसी
से
तेरा
चक्कर
चल
रहा
था
उसको
मैं
अच्छी
तरह
से
जानता
था
रातें
रौशन
थी
किसी
की
तुझ
सेे
दिलबर
तो
किसी
का
तेरे
बा'इस
रत-जगा
था
- Dileep Kumar
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अभी
रौशन
हुआ
जाता
है
रस्ता
वो
देखो
एक
औरत
आ
रही
है
Shakeel Jamali
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लड़कियाँ
बैठी
थीं
पाँव
डालकर
रौशनी
सी
हो
गई
तालाब
में
Parveen Shakir
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तेज़
धूप
में
आई
ऐसी
लहर
सर्दी
की
मोम
का
हर
इक
पुतला
बच
गया
पिघलने
से
Qateel Shifai
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आज
की
रात
दिवाली
है
दिए
रौशन
हैं
आज
की
रात
ये
लगता
है
मैं
सो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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चिलचिलाती
धूप
है
और
पैर
में
चप्पल
नहीं
जिस्म
घाइल
है
मगर
ये
हौसला
घाइल
नहीं
Tanoj Dadhich
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धूप
में
निकलो
घटाओं
में
नहा
कर
देखो
ज़िंदगी
क्या
है
किताबों
को
हटा
कर
देखो
Nida Fazli
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रौशनी
आधी
इधर
आधी
उधर
इक
दिया
रक्खा
है
दीवारों
के
बीच
Obaidullah Aleem
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घर
में
ठंडे
चूल्हे
पर
अगर
ख़ाली
पतीली
है
बताओ
कैसे
लिख
दूँ
धूप
फागुन
की
नशीली
है
Adam Gondvi
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सभी
के
दीप
सुंदर
हैं
हमारे
क्या
तुम्हारे
क्या
उजाला
हर
तरफ़
है
इस
किनारे
उस
किनारे
क्या
Hafeez Banarasi
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ज़ेहन
में
पिंदार
ही
पिंदार
है
पर
अकेले
चलना
भी
दुश्वार
है
और
कोई
मसअला
भी
अब
नहीं
दरमियाँ
बस
एक
ही
दीवार
है
चाय
क्या
पीते
ख़बर
क्या
पढ़ते
हम
ख़ून
से
लथपथ
जो
ये
अख़बार
है
जीत
से
पहले
अलग
हैं,
बाद
में
नेता
लोगों
के
अलग
किरदार
है
हम
करें
शिकवा
भी
तो
किस
से
करें
जब
हमारे
दोस्त
ही
दो-चार
है
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Dileep Kumar
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रोज़
थोड़ा
बहुत
ग़म
कमाते
रहे
फिर
उसी
को
कमाई
बताते
रहे
इश्क़
करते
रहे
उम्र
भर
और
फिर
उम्र
भर
इश्क़
से
खौफ़
खाते
रहे
और
कुछ
साफ़
किरदार
के
लोग
ही
देश
में
बस्तियों
को
जलाते
रहे
होश
में
आ
न
जाऊँ
कहीं
इस
लिए
जाम
पे
जाम
मुझ
को
पिलाते
रहे
जाननी
थी
सभी
को
कहानी
मिरी
हम
मगर
इक
फ़साना
सुनाते
रहे
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Dileep Kumar
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वहीं
रिश्ते
खरे
मालूम
होते
हैं
ज़रा
सी
भूल
से
जो
टूट
जाते
हैं
Dileep Kumar
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मुझको
वो
इतना
बे-ज़ार
कर
देता
है
मेरा
जीना
भी
दुश्वार
कर
देता
है
जिस
तरह
हँस
के
मिलता
है
हर
एक
से
मुझको
भी
वो
मिलन-सार
कर
देता
है
वो
जो
मुमकिन
नहीं
है
कहानी
से
भी
काम
वो
एक
किरदार
कर
देता
है
घर
हो
जाते
हैं
मिसमार
इस
से
मगर
इक
ग़लत
दाँव
बेदार
कर
देता
है
इश्क़
कुछ
भी
नहीं
इक
मरज़
के
सिवा
अच्छे
अच्छों
को
बीमार
कर
देता
है
बोती
थी
पहले
नफ़रत
सियासत,
मगर
अब
ये
भी
काम
अख़बार
कर
देता
है
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Dileep Kumar
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मोहब्बत
भले
ही
ज़ियादा
नहीं
है
बिछड़ने
का
कोई
इरादा
नहीं
है
Dileep Kumar
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