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Prashant Arahat
aazmaakar dekh lo maine kaha hai ishq meraa
aazmaakar dekh lo maine kaha hai ishq meraa | आज़माकर देख लो मैंने कहा है इश्क़ मेरा
- Prashant Arahat
आज़माकर
देख
लो
मैंने
कहा
है
इश्क़
मेरा
झूम
जाओगे
ये
इक
चढ़ता
नशा
है
इश्क़
मेरा
एक
पत्थर
को
तराशा
प्यार
से
मूरत
बनाई
लोग
उसको
पूजते
हैं
ये
कला
है
इश्क़
मेरा
यार
सुनने
में
अभी
आया
कि
शादी
तय
हुई
है
बीच
में
ही
अब
अधूरा
रह
गया
है
इश्क़
मेरा
यार
वो
वादे
इरादे
कुछ
नहीं
माने
हैं
पापा
कॉल
पर
बोली
अधूरा
ही
रहा
है
इश्क़
मेरा
- Prashant Arahat
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फिजूलखर्ची
नहीं
करेंगे
हमारे
चंद
अच्छे
दोस्तों
ने
ये
वा'दा
ख़ुद
से
किया
हुआ
है
कि
शक्ल
अल्लाह
ने
अच्छी
दी
है
सो
बातें
अच्छी
नहीं
करेंगे
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Rehman Faris
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तुम
ने
स्वेटर
बुना
था
मिरे
नाम
का
मैं
भी
लाया
था
कुछ
सर्दियाँ
जंगली
Shakeel Azmi
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सगी
बहनों
का
जो
रिश्ता
रिश्ता
है
उर्दू
और
हिन्दी
में
कहीं
दुनिया
की
दो
ज़िंदा
ज़बानों
में
नहीं
मिलता
Munawwar Rana
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अगर
मैं
कथा
का
क़लमकार
होता
यक़ीनन
ही
वो
तो
मिरा
यार
होता
लगाती
नहीं
हर
दफ़ा
वो
बहाने
लगा
लेती
सीने
से
गर
प्यार
होता
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Vijay Potter Singhadiya
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दूर
तक
छाए
थे
बादल
और
कहीं
साया
न
था
इस
तरह
बरसात
का
मौसम
कभी
आया
न
था
Qateel Shifai
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कमरे
में
सिगरेटों
का
धुआँ
और
तेरी
महक
जैसे
शदीद
धुँध
में
बाग़ों
की
सैर
हो
Umair Najmi
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सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
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Abrar Kashif
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मैं
कहता
हूँ
"सुनो
लड़की!
मुझे
कुछ
तुम
से
कहना
था"
वो
ऐसे
पूछती
है
फिर
मैं
सब
कुछ
भूल
जाता
हूँ
Shadab Asghar
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ऐ
मुझ
को
फ़रेब
देने
वाले
मैं
तुझ
पे
यक़ीन
कर
चुका
हूँ
Athar Nafees
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कुछ
एक
की
हम
जैसी
क़िस्मत
होती
है
बाकी
सब
की
अच्छी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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ज़िंदगी
है
चार
दिन
की
लोग
ऐसा
कह
रहे
हैं
चार
दिन
ही
बस
सही
मैं
और
जीना
चाहता
हूँ
Prashant Arahat
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जिस्म
को
चादर
बनाया
ही
नहीं
रात
भर
दीपक
बुझाया
ही
नहीं
फ़र्ज़
उसको
जो
निभाना
चाहिए
वो
कभी
उसने
निभाया
ही
नहीं
हाल
दिल
का
सब
कहा
है
शे'र
में
राज़
कुछ
उन
सेे
छुपाया
ही
नहीं
जो
कहा
था
शे'र
उनके
वास्ते
वो
कभी
उनको
सुनाया
ही
नहीं
मैं
बहुत
ही
चाहता
उसको
रहा
पर
कभी
उसको
बताया
ही
नहीं
बाँट
लेते
आपके
हम
दर्द-ओ-ग़म
आपने
अपना
बनाया
ही
नहीं
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Prashant Arahat
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क़ीमत
घटाकर
देखिए
बाज़ार
में
सामान
की
फ़ाक़ाकशी
शायद
घटे
फिर
मुल्क
में
इंसान
की
Prashant Arahat
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ख़ुद
मुहब्बत
के
सफ़र
में
शौक़
से
आए
हो
तुम
क्या
हुआ
अब
इस
तरह
किस
सोच
में
बैठे
हो
तुम
इस
उदासी
का
सबब
हम
से
कभी
पूछा
नहीं
और
कहते
हो
बहुत
कम
आजकल
हँसते
हो
तुम
ख़्वाब
में
ही
देखता
हूँ
ख़ुद
को
उसके
साथ
में
और
माँ
कहती
है
बेटा
देर
तक
सोते
हो
तुम
एक
शिकवा
है
मुझे
वो
हाल
मेरा
पूछता
फ़ोन
करता
और
कहता
यार
अब
कैसे
हो
तुम
पूछता
था
कल
कोई
अरहत
ये
शाहाबाद
है
एक
हरदोई
का
कस्बा
क्या
वहीं
रहते
हो
तुम
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Prashant Arahat
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नए
किरदार
लेकर
के
कहानीकार
ने
फिर
से
यही
सच
है
कहानी
सी
कहानी
फिर
बनाई
है
भुला
दो
बात
सारी
प्यार
के
सारे
झमेलों
को
मुझे
इस
बात
पर
कोई
नहीं
देनी
सफ़ाई
है
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Prashant Arahat
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