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Abrar Kashif
sitaare aur qismat dekh kar ghar se nikalte hain
sitaare aur qismat dekh kar ghar se nikalte hain | सितारे और क़िस्मत देख कर घर से निकलते हैं
- Abrar Kashif
सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
- Abrar Kashif
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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कोहरा
तो
इस
उदासी
का
घना
है
और
सबका
दिल
भी
पत्थर
का
बना
है
रोने
से
मन
हल्का
होता
होगा
लेकिन
मैं
तो
लड़का
हूँ,
मुझे
रोना
मना
है
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Daqiiq Jabaali
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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शे'र
दर-अस्ल
हैं
वही
'हसरत'
सुनते
ही
दिल
में
जो
उतर
जाएँ
Hasrat Mohani
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ख़मोशी
तो
यही
बतला
रही
है
उदासी
रास
मुझको
आ
रही
है
मुझे
जिन
ग़लतियों
से
सीखना
था
वही
फिर
ज़िंदगी
दोहरा
रही
है
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Vishal Singh Tabish
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अजीब
सानेहा
मुझ
पर
गुज़र
गया
यारो
मैं
अपने
साए
से
कल
रात
डर
गया
यारो
Shahryar
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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इस
तरह
तल्ख़
नवाई
से
नहीं
चलता
है
काम
दुनिया
में
बुराई
से
नहीं
चलता
है
प्यार
ज़िंदा
है
ज़माने
में
भले
लोगों
से
प्यार
का
नाम
लड़ाई
से
नहीं
चलता
है
मेरे
बच्चों
की
इबादत
भी
है
इस
में
शामिल
घर
फ़क़त
मेरी
कमाई
से
नहीं
चलता
है
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Abrar Kashif
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अगर
तुम
हो
तो
घबराने
की
कोई
बात
थोड़ी
है
ज़रा
सी
बूँदा-बाँदी
है
बहुत
बरसात
थोड़ी
है
ये
राह-ए-इश्क़
है
इस
में
क़दम
ऐसे
ही
उठते
हैं
मोहब्बत
सोचने
वालों
के
बस
की
बात
थोड़ी
है
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Abrar Kashif
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घर
की
तक़सीम
में
अँगनाई
गँवा
बैठे
हैं
फूल
गुलशन
से
शनासाई
गँवा
बैठे
हैं
बात
आँखों
से
समझ
लेने
का
दावा
मत
कर
हम
इसी
शौक़
में
बीनाई
गँवा
बैठे
हैं
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Abrar Kashif
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करती
है
तो
करने
दे
हवाओं
को
शरारत
मौसम
का
तकाज़ा
है
कि
बालों
को
खुला
छोड़
Abrar Kashif
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दिन
में
मिल
लेते
कहीं
रात
ज़रूरी
थी
क्या?
बेनतीजा
ये
मुलाक़ात
ज़रूरी
थी
क्या
मुझ
सेे
कहते
तो
मैं
आँखों
में
बुला
लेता
तुम्हें
भीगने
के
लिए
बरसात
ज़रूरी
थी
क्या
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Abrar Kashif
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