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Abrar Kashif
din men mil lete kahii raat zaroori thii kya
din men mil lete kahii raat zaroori thii kya | दिन में मिल लेते कहीं रात ज़रूरी थी क्या?
- Abrar Kashif
दिन
में
मिल
लेते
कहीं
रात
ज़रूरी
थी
क्या?
बेनतीजा
ये
मुलाक़ात
ज़रूरी
थी
क्या
मुझ
सेे
कहते
तो
मैं
आँखों
में
बुला
लेता
तुम्हें
भीगने
के
लिए
बरसात
ज़रूरी
थी
क्या
- Abrar Kashif
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दिन
सलीक़े
से
उगा
रात
ठिकाने
से
रही
दोस्ती
अपनी
भी
कुछ
रोज़
ज़माने
से
रही
Nida Fazli
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चूँकि
रोना
बहाल
रहता
है
ख़ुश्क
आँखों
का
हाल
रहता
है
नींद
आँखों
से
क्यूँँ
गुरेज़ा
है
रात
भर
ये
सवाल
रहता
है
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Sumit Panchal
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आज
सड़कों
पर
लिखे
हैं
सैकड़ों
नारे
न
देख
पर
अँधेरा
देख
तू
आकाश
के
तारे
न
देख
Dushyant Kumar
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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अजीब
सानेहा
मुझ
पर
गुज़र
गया
यारो
मैं
अपने
साए
से
कल
रात
डर
गया
यारो
Shahryar
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मैं
रोज़
रात
यही
सोच
कर
तो
सोता
हूँ
कि
कल
से
वक़्त
निकालूँगा
ज़िन्दगी
के
लिए
Swapnil Tiwari
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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कहाँ
है
तू
कि
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐ
दोस्त
तमाम
रात
सुलगते
हैं
दिल
के
वीराने
Nasir Kazmi
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हाल
मीठे
फलों
का
मत
पूछो
रात
दिन
चाकूओं
में
रहते
हैं
Fahmi Badayuni
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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मैं
अपने
दोनों
तरफ़
एक
सा
हूँ
तेरे
लिए
किसी
से
शर्त
लगा
फिर
मुझे
उछाल
के
देख
Abrar Kashif
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अपने
दिल
में
बसाओगे
हमको
और
गले
से
लगाओगे
हमको
हम
नहीं
इतने
प्यार
के
क़ाबिल
तुम
तो
पागल
बनाओगे
हमको
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Abrar Kashif
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वो
तो
अच्छा
है
ग़ज़ल
तेरा
सहारा
है
मुझे
वर्ना
फ़िक्रों
ने
तो
बस
घेर
के
मारा
है
मुझे
जिसकी
तस्वीर
मैं
काग़ज़
पे
बना
भी
न
सका
उसने
मेहँदी
से
हथेली
पे
उतारा
है
मुझे
ग़ैर
के
हाथ
से
मरहम
मुझे
मंज़ूर
नहीं
तुम
मगर
ज़ख़्म
भी
दे
दो
तो
गवारा
है
मुझे
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Abrar Kashif
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तरीक़े
और
भी
हैं
इस
तरह
परखा
नहीं
जाता
चराग़ों
को
हवा
के
सामने
रक्खा
नहीं
जाता
मोहब्बत
फ़ैसला
करती
है
पहले
चंद
लम्हों
में
जहाँ
पर
इश्क़
होता
है
वहाँ
सोचा
नहीं
जाता
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Abrar Kashif
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करती
है
तो
करने
दे
हवाओं
को
शरारत
मौसम
का
तकाज़ा
है
कि
बालों
को
खुला
छोड़
Abrar Kashif
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