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Bhaskar Shukla
kuchh ek ki ham jaisi qismat hoti hai
kuchh ek ki ham jaisi qismat hoti hai | कुछ एक की हम जैसी क़िस्मत होती है
- Bhaskar Shukla
कुछ
एक
की
हम
जैसी
क़िस्मत
होती
है
बाकी
सब
की
अच्छी
क़िस्मत
होती
है
- Bhaskar Shukla
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मैं
ने
मेहनत
से
हथेली
पे
लकीरें
खींचीं
वो
जिन्हें
कातिब-ए-तक़दीर
नहीं
खींच
सका
Umair Najmi
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अपनी
कि़स्मत
में
ही
जब
इश्क़
नहीं
है
यारो
किसलिए
अश्क-ए-लहू
इश्क़
में
जाया
करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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किसी
को
साल-ए-नौ
की
क्या
मुबारकबाद
दी
जाए
कैलन्डर
के
बदलने
से
मुक़द्दर
कब
बदलता
है
Aitbar Sajid
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ख़ुश
रहते
हैं
हँस
सकते
हैं
भोले
भाले
होते
हैं
वो
जो
शे'र
नहीं
कहते
हैं
क़िस्मत
वाले
होते
हैं
पीना
अच्छी
बात
नहीं
है
आते
हैं
समझाने
दोस्त
और
ढलते
ही
शाम
उन्हें
फिर
हमीं
सँभाले
होते
हैं
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Vineet Aashna
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किताब-ए-मुक़द्दर
में
रांझा
दिवाना
मगर
हीर
बेहद
सयानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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जुदा
किसी
से
किसी
का
ग़रज़
हबीब
न
हो
ये
दाग़
वो
है
कि
दुश्मन
को
भी
नसीब
न
हो
Nazeer Akbarabadi
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ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
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Vashu Pandey
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मुझे
भी
अपनी
क़िस्मत
पर
हमेशा
नाज़
रहता
है
सुना
है
ख़्वाहिशें
उनकी
भी
शर्मिंदा
नहीं
रहती
सुना
है
वो
भी
अब
तक
खाए
बैठी
हैं
कई
शौहर
बहुत
दिन
तक
मेरी
भी
बीवियाँ
ज़िंदा
नहीं
रहती
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Paplu Lucknawi
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तदबीर
के
दस्त-ए-रंगीं
से
तक़दीर
दरख़्शाँ
होती
है
क़ुदरत
भी
मदद
फ़रमाती
है
जब
कोशिश-ए-इंसाँ
होती
है
Hafeez Banarasi
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गर
ये
अच्छी
क़िस्मत
है
तो
लानत
ऐसी
क़िस्मत
पर
अपने
फोन
में
देख
रहे
हैं,
बाप
को
बूढ़ा
होते
हम
Siddharth Saaz
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वैसे
तो
उसका
नाम
नहीं
हाफ़िज़े
में
अब
मुमकिन
है
रूबरू
जो
कभी
हो,
पुकार
दूँ
Bhaskar Shukla
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मुस्कुराहट
ओढ़कर
यूँँ
ही
नहीं
रहता
हूँ
मैं
झाँककर
देखो
कभी
अंदर
बहुत
टूटा
हूँ
मैं
ज़िन्दगी
भर
का
तो
वा'दा
ज़िन्दगी
से
कर
लिया
हाँ
मगर
ऐ
मौत
!
उसके
बाद
बस
तेरा
हूँ
मैं
काश
!
झूठा
ही
सही,
वो
पूछता
कैसे
हो
तुम
मैं
भुला
देता
हर
इक
ग़म,
बोलता,
अच्छा
हूँ
मैं
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Bhaskar Shukla
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तुम्हें
ये
किसने
कहा
रब
को
नहीं
मानता
मैं
ये
और
बात
कि
मज़हब
को
नहीं
मानता
मैं
Bhaskar Shukla
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ख़्वाहिश
सब
रखते
हैं
तुझको
पाने
की
और
फिर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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ना
तो
कुछ
सुनते
हैं
ना
ही
बोल
कुछ
पाते
हैं
हम
सामने
उनके
सरापा
आँख
हो
जाते
हैं
हम
वो
निगाहें
इन
निगाहों
से
कभी
हटती
नहीं
वरना
कितनी
ही
निगाहें
हैं
जिन्हें
भाते
हैं
हम
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Bhaskar Shukla
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