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Vashu Pandey
ye kab kahte hain ki aakar hamko gale laga le vo
ye kab kahte hain ki aakar hamko gale laga le vo | ये कब कहते हैं कि आकर हमको गले लगा ले वो
- Vashu Pandey
ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
- Vashu Pandey
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काश
जन्नत
हमें
मिले
ऐसी
हर
तरफ़
आशिक़ाना
मौसम
हो
Amaan Pathan
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ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
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Khurram Afaq
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मैं
आख़िर
कौन
सा
मौसम
तुम्हारे
नाम
कर
देता
यहाँ
हर
एक
मौसम
को
गुज़र
जाने
की
जल्दी
थी
Rahat Indori
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लब-ए-दरिया
पे
देख
आ
कर
तमाशा
आज
होली
का
भँवर
काले
के
दफ़
बाजे
है
मौज
ऐ
यार
पानी
में
Shah Naseer
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मिरे
माँ
बाप
जन्नत
से
नज़र
रखते
हैं
मुझ
पर
अब
मिरे
दिल
में
यतीमों
के
लिए
इक
ख़ास
कोना
है
Amaan Pathan
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सर्दी
और
गर्मी
के
उज़्र
नहीं
चलते
मौसम
देख
के
साहब
इश्क़
नहीं
होता
Moin Shadab
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शदीद
प्यास
थी
फिर
भी
छुआ
न
पानी
को
मैं
देखता
रहा
दरिया
तिरी
रवानी
को
Shahryar
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हम
क्या
जानें
जन्नत
कैसी
होती
है
उस
सेे
पूछो
जिसने
तुमको
पाया
है
Harsh saxena
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हमारा
काम
तो
मौसम
का
ध्यान
करना
है
और
उस
के
बाद
के
सब
काम
शश-जहात
के
हैं
Pallav Mishra
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तुम
ने
किया
है
तुम
ने
इशारा
बहुत
ग़लत
दरिया
बहुत
दुरुस्त
किनारा
बहुत
ग़लत
Nabeel Ahmed Nabeel
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इश्क़
क़ैस
फ़रहाद
रोमियो
जैसे
ही
कर
सकते
हैं
हम
तो
ठहरे
दस
से
छह
तक
ऑफ़िस
जाने
वाले
लोग
Vashu Pandey
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इसलिए
भी
इस
शजर
से
सबको
इतना
प्यार
है
दे
रहा
है
फल
अभी
ये
और
सायादार
है
ऐ
ख़ुदा
इस
ना-ख़ुदा
की
ख़ैर
हो
ये
नासमझ
ये
समझता
है
कि
इसके
हाथ
में
पतवार
है
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Vashu Pandey
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तुम्हें
कैसा
लगेगा
गर
किसी
पिंजरे
में
रख
कर
के
कोई
तुम
सेे
कहे
तेरी
हिफ़ाज़त
कर
रहे
हैं
हम
Vashu Pandey
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दो
ही
काम
थे
रोते
थे
पछताते
थे
बस
ये
ही
कर
पाते
थे
पछताते
थे
अपनी
बढिया
कटती
थी
सहराओं
में
दिन
भर
ख़ाक़
उड़ाते
थे
पछताते
थे
पछताने
से
हासिल
क्या
होना
था
बस
अपना
ख़ून
जलाते
थे
पछताते
थे
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Vashu Pandey
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अपने
पाले
में
मुक़द्दर
तो
नहीं
आ
सकता
हिज्र
की
शब
वो
मेरे
घर
तो
नहीं
आ
सकता
देखने
वाले
तेरी
दीद
के
सदके
लेकिन
कोई
तस्वीर
से
बाहर
तो
नहीं
आ
सकता
आप
जो
ठीक
समझते
हैं
वो
करिए
साहब
ऐसे
मौसम
में
मैं
दफ़्तर
तो
नहीं
आ
सकता
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Vashu Pandey
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