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Prashant Arahat
qeemat ghatakar dekhiye bazaar men samaan kii
qeemat ghatakar dekhiye bazaar men samaan kii | क़ीमत घटाकर देखिए बाज़ार में सामान की
- Prashant Arahat
क़ीमत
घटाकर
देखिए
बाज़ार
में
सामान
की
फ़ाक़ाकशी
शायद
घटे
फिर
मुल्क
में
इंसान
की
- Prashant Arahat
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इंसान
अपने
आप
में
मजबूर
है
बहुत
कोई
नहीं
है
बे-वफ़ा
अफ़्सोस
मत
करो
Bashir Badr
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ऐ
आसमान
तेरे
ख़ुदा
का
नहीं
है
ख़ौफ़
डरते
हैं
ऐ
ज़मीन
तेरे
आदमी
से
हम
Unknown
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जो
मेरे
साथ
मोहब्बत
में
हुई
आदमी
एक
दफा
सोचेगा
रात
इस
डर
में
गुजारी
हमने
कोई
देखेगा
तो
क्या
सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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अब
जो
पत्थर
है
आदमी
था
कभी
इस
को
कहते
हैं
इंतिज़ार
मियाँ
Afzal Khan
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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इत्तिफ़ाक़
अपनी
जगह
ख़ुश-क़िस्मती
अपनी
जगह
ख़ुद
बनाता
है
जहाँ
में
आदमी
अपनी
जगह
Anwar Shaoor
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उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी
से
अंजुम
सह
में
जाते
हैं
कि
ये
टूटा
हुआ
तारा
मह-ए-कामिल
न
बन
जाए
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Allama Iqbal
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सुब्ह-ए-मग़रूर
को
वो
शाम
भी
कर
देता
है
शोहरतें
छीन
के
गुमनाम
भी
कर
देता
है
वक़्त
से
आँख
मिलाने
की
हिमाकत
न
करो
वक़्त
इंसान
को
नीलाम
भी
कर
देता
है
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Nadeem Farrukh
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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लोगों
ने
बहुत
चाहा
अपना
सा
बना
डालें
पर
हम
ने
कि
अपने
को
इंसान
बहुत
रक्खा
Abdul Hameed
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छोड़
गई
है
मुझको
तो
इसकी
कोई
परवाह
नहीं
उस
सेे
अच्छी
लड़की
से
अब
इश्क़
हमारा
चलता
है
Prashant Arahat
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उगाई
फ़स्ल
मैंने
थी
बड़ी
मेहनत
लगाकर
के
मगर
बेवक़्त
बारिश
ने
तबाही
सी
मचाई
है
Prashant Arahat
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हमीं
से
दूर
जाना
चाहता
है
तभी
वो
पास
आना
चाहता
है
नई
दुनिया
बनाई
है
वहाँ
पर
वही
मुझको
दिखाना
चाहता
है
चुराता
आज
है
नज़रों
से
नज़रें
किसी
सच
को
छुपाना
चाहता
है
जफ़ा
की
सब
हदों
को
तोड़कर
भी
वफ़ादारी
निभाना
चाहता
है
परिंदा
रह
नहीं
सकता
अकेले
नया
वो
भी
ठिकाना
चाहता
है
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Prashant Arahat
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धूप
इतनी
है
कि
छाया
भी
ठिकाना
चाहती
है
आज
कल
वो
साथ
मेरा
छोड़
जाना
चाहती
है
चाहती
है
साथ
देना
हर
घड़ी
में
हर
समय
पर
चिलचिलाती
धूप
में
दामन
बचाना
चाहती
है
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Prashant Arahat
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किनारे
पर
लगाने
को
मेरी
कश्ती
वही
माँझी
बदलकर
रूप
को
अपने
वही
हर
बार
आएगा
Prashant Arahat
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