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Zafar Siddqui
zulm kii intiha burii hogii
zulm kii intiha burii hogii | ज़ुल्म की इंतिहा बुरी होगी
- Zafar Siddqui
ज़ुल्म
की
इंतिहा
बुरी
होगी
सोच
कर
बस
ये
मर
गया
कोई
- Zafar Siddqui
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हुई
है
आँख
क्यूँ
पुर-नम
समझ
ले
ज़फ़र
के
प्यार
को
हमदम
समझ
ले
सही
जाती
नहीं
फ़ुर्क़त
तिरी
अब
मिरे
ग़म
को
तू
अपना
ग़म
समझ
ले
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Zafar Siddqui
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ये
तुम्हें
क्या
हुआ
है
क्या
ग़म
है
तुम
बताओ
तो
आँख
क्यूँ
नम
है
एक
ही
घूँट
में
शिफ़ा
होगी
पीके
देखो
ये
आब-ए-ज़मज़म
है
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Zafar Siddqui
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प्यास
बुझती
नहीं
होंठ
सूखे
पड़े
हाल
क्या
हो
गया
ग़म
के
बाज़ार
में
रात
कटती
है
बिस्तर
पे
करवट
में
अब
चैन
लूटा
है
तू
ने
सनम
प्यार
में
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Zafar Siddqui
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कितने
प्यारे
हैं
ये
सुहाने
ख़त
पढ़
रहा
हूँ
तिरे
पुराने
ख़त
ख़त
के
लफ्ज़ों
में
है
तिरी
ख़ुशबू
चूमता
रहता
हूँ
सुहाने
ख़त
नींद
भी
फिर
सुहानी
आती
है
जब
भी
पढ़ता
हूँ
मैं
पुराने
ख़त
मैं
भुलाना
तो
चाहता
हूँ
तुझे
पर
नहीं
देते
हैं
भुलाने
ख़त
इश्क़
रुस्वा
न
होने
दूँगा
मैं
ये
किसी
को
नहीं
दिखाने
ख़त
याद
उसकी
ज़फर
सताती
है
देखता
जब
भी
हूँ
पुराने
ख़त
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Zafar Siddqui
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भूल
जाओ
ये
हिज्र
के
ग़म
को
वस्ल
की
शाम
मुस्कुराओ
तुम
इक
ज़माने
से
यार
हूँ
प्यासा
कुछ
मेरी
प्यास
तो
बुझाओ
तुम
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Zafar Siddqui
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