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Zafar Siddqui
kitne pyaare hain ye suhaane KHat
kitne pyaare hain ye suhaane KHat | कितने प्यारे हैं ये सुहाने ख़त
- Zafar Siddqui
कितने
प्यारे
हैं
ये
सुहाने
ख़त
पढ़
रहा
हूँ
तिरे
पुराने
ख़त
ख़त
के
लफ्ज़ों
में
है
तिरी
ख़ुशबू
चूमता
रहता
हूँ
सुहाने
ख़त
नींद
भी
फिर
सुहानी
आती
है
जब
भी
पढ़ता
हूँ
मैं
पुराने
ख़त
मैं
भुलाना
तो
चाहता
हूँ
तुझे
पर
नहीं
देते
हैं
भुलाने
ख़त
इश्क़
रुस्वा
न
होने
दूँगा
मैं
ये
किसी
को
नहीं
दिखाने
ख़त
याद
उसकी
ज़फर
सताती
है
देखता
जब
भी
हूँ
पुराने
ख़त
- Zafar Siddqui
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दरमियाँ
हैं
फ़ासले
ये
जानते
हैं
हम
मगर
रात
भर
फिर
भी
हमें
वो
याद
आती
है
बहुत
Amaan Pathan
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फिर
उसी
सितमगर
को
याद
कर
रहे
हैं
हम
यानी
बे-वजह
ग़म
ईजाद
कर
रहे
हैं
हम
Harsh saxena
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तेरी
अंँगड़ाई
के
आलम
का
ख़याल
आया
जब
ज़ेहन-ए-वीरांँ
में
खनकने
लगे
कंगन
कितने
Shashank Shekhar Pathak
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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ख़ुद
को
मसरूफ़
किए
रखने
की
कोशिश
करना
क्या
तेरी
याद
के
ज़ुमरे
में
नहीं
आता
है
Jawwad Sheikh
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ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
Adil Mansuri
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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जहाँ
पंखा
चल
रहा
है
वहीं
रस्सी
भी
पड़ी
है
मुझे
फिर
ख़याल
आया,
अभी
ज़िन्दगी
पड़ी
है
Zubair Ali Tabish
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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तीर
का
तेरे
निशाना
आ
गया
सामने
तेरा
दिवाना
आ
गया
ये
मोहब्बत
का
असर
भी
खूब
है
नफरतों
को
सर
झुकाना
आ
गया
हो
गया
मुझको
भी
हासिल
ये
हुनर
पत्थरों
में
गुल
खिलाना
आ
गया
देख
कर
अब
मुस्कुरा
देता
है
वो
दिल
उसे
भी
अब
चुराना
आ
गया
वो
अदब
से
पेश
भी
आने
लगे
प्यार
उन
को
भी
निभाना
आ
गया
ठोकरें
खा
कर
मुझे
भी
दोस्तों
राह
पर
चलना
चलाना
आ
गया
जब
से
आदत
सोचने
की
छोड़
दी
फिर
ज़फर
को
मुस्कुराना
आ
गया
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Zafar Siddqui
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ये
तुम्हें
क्या
हुआ
है
क्या
ग़म
है
तुम
बताओ
तो
आँख
क्यूँ
नम
है
एक
ही
घूँट
में
शिफ़ा
होगी
पीके
देखो
ये
आब-ए-ज़मज़म
है
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Zafar Siddqui
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उम्र
भर
की
मेरी
कमाई
हो
पास
आ
हिज्र
रिहाई
हो
तू
कोई
तो
दवा
बता
ऐसी
ज़ख़्म
की
जो
मिरे
दवाई
हो
ज़िन्दगी
भर
ही
ज़ख़्म
झेले
हैं
ज़ख़्म
से
काश
अब
जुदाई
हो
शोहरतें
क्यूँ
नहीं
मिलेंगी
मुझे
हर
तरफ़
मेरी
भी
बुराई
हो
फ़ाइलातुन
मुफ़ाइलुन
फ़ेलुन
काश
इस
बह्र
में
रुबाई
हो
एक
पल
भी
बता
मुझे
ऐसा
जब
'ज़फ़र'
ने
ख़ुशी
मनाई
हो
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Zafar Siddqui
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मैने
बचा
रखा
है
ईमान
ज़िन्दगी
में
दूँ
साथ
हक
का
है
ये
अरमान
ज़िन्दगी
में
मैं
चल
पड़ा
मिटाने
नफ़रत
जहाँ
से
सारे
ये
राह
भी
नहीं
है
आसान
ज़िन्दगी
में
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Zafar Siddqui
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यूँँ
सितम
उसने
माँ
पे
ढाया
है
माँ
के
ज़ेवर
ही
बेच
आया
है
चापलूसी
है
करता
बीवी
की
और
माँ
को
फ़क़त
सताया
है
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Zafar Siddqui
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