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Zafar Siddqui
bhool jaao ye hijr ke gam ko
bhool jaao ye hijr ke gam ko | भूल जाओ ये हिज्र के ग़म को
- Zafar Siddqui
भूल
जाओ
ये
हिज्र
के
ग़म
को
वस्ल
की
शाम
मुस्कुराओ
तुम
इक
ज़माने
से
यार
हूँ
प्यासा
कुछ
मेरी
प्यास
तो
बुझाओ
तुम
- Zafar Siddqui
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क्या
कहा
दोस्त
समझना
है
तुम्हें
प्यार
नहीं
यानी
बस
देखना
है
पानी
को
पीना
नहीं
है
Neeraj Neer
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आ
कि
तुझ
बिन
इस
तरह
ऐ
दोस्त
घबराता
हूँ
मैं
जैसे
हर
शय
में
किसी
शय
की
कमी
पाता
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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मकाँ
तो
है
नहीं
जो
खींच
दें
दीवार
इस
दिल
में
कोई
दूजा
नहीं
रह
पाएगा
अब
यार
इस
दिल
में
जहाँ
भर
में
लुटाते
फिर
रहे
है
कम
नहीं
होता
तुम्हारे
वास्ते
इतना
रखा
था
प्यार
इस
दिल
में
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Bhaskar Shukla
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यार
तस्वीर
में
तन्हा
हूँ
मगर
लोग
मिले
कई
तस्वीर
से
पहले
कई
तस्वीर
के
बा'द
Umair Najmi
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तू
उसके
दिल
में
जगह
चाहता
है
यार
जो
शख़्स
किसी
को
देता
नहीं
अपने
साथ
वाली
जगह
Umair Najmi
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तिरे
लबों
में
मिरे
यार
ज़ाइक़ा
नहीं
है
हज़ार
बोसे
हैं
उन
पर
प
इक
दु'आ
नहीं
है
Pallav Mishra
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वो
हिंदू,
मैं
मुस्लिम,
ये
सिक्ख,
वो
ईसाई
यार
ये
सब
सियासत
है
चलो
इश्क़
करें
Rahat Indori
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फ़िराक़-ए-यार
ने
बेचैन
मुझ
को
रात
भर
रक्खा
कभी
तकिया
इधर
रक्खा
कभी
तकिया
उधर
रक्खा
Ameer Minai
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एक
आवाज़
कि
जो
मुझको
बचा
लेती
है
ज़िन्दगी
आख़री
लम्हों
में
मना
लेती
है
जिस
पे
मरती
हो
उसे
मुड़
के
नहीं
देखती
वो
और
जिसे
मारना
हो
यार
बना
लेती
है
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Ali Zaryoun
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हुई
है
आँख
क्यूँ
पुर-नम
समझ
ले
ज़फ़र
के
प्यार
को
हमदम
समझ
ले
सही
जाती
नहीं
फ़ुर्क़त
तिरी
अब
मिरे
ग़म
को
तू
अपना
ग़म
समझ
ले
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Zafar Siddqui
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तीर
का
तेरे
निशाना
आ
गया
सामने
तेरा
दिवाना
आ
गया
ये
मोहब्बत
का
असर
भी
खूब
है
नफरतों
को
सर
झुकाना
आ
गया
हो
गया
मुझको
भी
हासिल
ये
हुनर
पत्थरों
में
गुल
खिलाना
आ
गया
देख
कर
अब
मुस्कुरा
देता
है
वो
दिल
उसे
भी
अब
चुराना
आ
गया
वो
अदब
से
पेश
भी
आने
लगे
प्यार
उन
को
भी
निभाना
आ
गया
ठोकरें
खा
कर
मुझे
भी
दोस्तों
राह
पर
चलना
चलाना
आ
गया
जब
से
आदत
सोचने
की
छोड़
दी
फिर
ज़फर
को
मुस्कुराना
आ
गया
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Zafar Siddqui
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जो
अदब
की
है
पहचान
पढ़ता
हूँ
मैं
मीर-ओ-ग़ालिब
का
दीवान
पढ़ता
हूँ
मैं
मत
पढ़ाओ
मुझे
पाठ
नफ़रत
का
तुम
अम्न
जिस
में
है
क़ुरआन
पढ़ता
हूँ
मैं
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Zafar Siddqui
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वो
बड़े
ही
सख़्त
तेवर
में
दिखा
है
इश्क़
के
भी
आज
फ़ेवर
में
दिखा
है
हो
गई
काफ़ूर
चेहरे
की
कशिश
भी
हिज्र
का
ग़म
उसके
ज़ेवर
में
दिखा
है
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Zafar Siddqui
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कॉल
पर
कॉल
हमदम
करे
है
राह
दुश्वार
मौसम
करे
है
बीच
मझधार
में
फँस
गया
हूँ
आँख
ये
मसअला
नम
करे
है
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Zafar Siddqui
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