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Zafar Siddqui
call par call hamdam kare hai
call par call hamdam kare hai | कॉल पर कॉल हमदम करे है
- Zafar Siddqui
कॉल
पर
कॉल
हमदम
करे
है
राह
दुश्वार
मौसम
करे
है
बीच
मझधार
में
फँस
गया
हूँ
आँख
ये
मसअला
नम
करे
है
- Zafar Siddqui
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मैंने
बस
इतना
पूछा
था
क्या
देखते
हो
भला
मैंने
ये
कब
कहा
था
मुझे
देखना
छोड़
दो
गीली
मिट्टी
की
ख़ुशबू
मुझे
सोने
देती
नहीं
मेरे
बालों
में
तुम
उँगलियाँ
फेरना
छोड़
दो
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Tajdeed Qaiser
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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आईने
आँख
में
चुभते
थे
बिस्तर
से
बदन
कतराता
था
एक
याद
बसर
करती
थी
मुझे
मैं
साँस
नहीं
ले
पाता
था
Tehzeeb Hafi
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सुखा
ली
सबने
ही
आँखें
हवा
ए
ज़िन्दगी
से
यहाँ
अब
भी
वही
रोना
रुलाना
चल
रहा
है
Farhat Ehsaas
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अब
ज़रूरी
तो
नहीं
है
कि
वो
सब
कुछ
कह
दे
दिल
में
जो
कुछ
भी
हो
आँखों
से
नज़र
आता
है
मैं
उस
सेे
सिर्फ़
ये
कहता
हूँ
कि
घर
जाना
है
और
वो
मारने
मरने
पे
उतर
आता
है
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Tehzeeb Hafi
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हुस्न
सब
को
ख़ुदा
नहीं
देता
हर
किसी
की
नज़र
नहीं
होती
Ibn E Insha
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देर
तक
आँख
मुसीबत
में
पड़ी
रहती
है
तुम
चले
जाते
हो,
तस्वीर
बनी
रहती
है
Fauziya Rabab
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कबूतर
इश्क़
का
उतरे
तो
कैसे?
तुम्हारी
छत
पे
निगरानी
बहुत
है
इरादा
कर
लिया
गर
ख़ुद-कुशी
का
तो
ख़ुद
की
आँख
का
पानी
बहुत
है
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Kumar Vishwas
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कल
रात
मैं
बहुत
ही
अलग
सा
लगा
मुझे
उसकी
नज़र
ने
यूँँ
मेरी
सूरत
खंगाली
दोस्त
Afzal Ali Afzal
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मंज़िलों
का
कौन
जाने
रहगुज़र
अच्छी
नहीं
उसकी
आँखें
ख़ूब-सूरत
है
नज़र
अच्छी
नहीं
Abrar Kashif
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मुहब्बत
ये
मुहब्बत
वो
मुहब्बत
सिवाए
दर्द-ओ-ग़म
के
कुछ
नहीं
है
Zafar Siddqui
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देख
ली
उसकी
ये
हुनर
मंदी
उस
ने
दिल
को
बना
लिया
बंदी
ये
समर
ये
शज़र
हवा
ठंडी
ख़ूब-तर
शान
है
ख़ुदावंदी
सोचता
हूँ
निकाह
कर
डालूँ
चाहिए
बस
तेरी
रज़ा
मंदी
झूठ
पर
झूठ
बोलते
रहना
सच
पे
लागू
यहाँ
है
पाबंदी
सर
झुका
कर
ज़फर
वो
चलते
हैं
जिनकी
नज़रों
में
है
हया
मंदी
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Zafar Siddqui
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भूल
जाओ
ये
हिज्र
के
ग़म
को
वस्ल
की
शाम
मुस्कुराओ
तुम
इक
ज़माने
से
यार
हूँ
प्यासा
कुछ
मेरी
प्यास
तो
बुझाओ
तुम
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Zafar Siddqui
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यूँँ
कोई
बे
वफ़ा
नहीं
होता
बे
सबब
ही
जुदा
नहीं
होता
आ
गए
लोग
कुछ
मदद
करने
हर
कोई
तो
बुरा
नहीं
होता
किस
घड़ी
किस
को
मौत
आ
जाए
ये
किसी
को
पता
नहीं
होता
जंग
दुश्मन
से
जीत
ली
मैंने
हौसला
हो
तो
क्या
नहीं
होता
ऐसे
रस्ते
पे
चल
पड़ा
हूँ
मैं
ख़त्म
ही
रास्ता
नहीं
होता
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Zafar Siddqui
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आग
से
खेलने
के
चक्कर
में
अपना
वो
हाथ
ही
जला
बैठे
Zafar Siddqui
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