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Zafar Siddqui
hui hai aankh kyuuñ pur-nam samajh le
hui hai aankh kyuuñ pur-nam samajh le | हुई है आँख क्यूँ पुर-नम समझ ले
- Zafar Siddqui
हुई
है
आँख
क्यूँ
पुर-नम
समझ
ले
ज़फ़र
के
प्यार
को
हमदम
समझ
ले
सही
जाती
नहीं
फ़ुर्क़त
तिरी
अब
मिरे
ग़म
को
तू
अपना
ग़म
समझ
ले
- Zafar Siddqui
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हम
ऐसे
लोग
भी
जाने
कहाँ
से
आते
हैं
ख़ुशी
में
रोते
हैं
जो
ग़म
में
मुस्कुराते
हैं
हमारा
साथ
भला
कब
तलक
निभाते
आप
कभी
कभी
तो
हमीं
ख़ुद
से
ऊब
जाते
हैं
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Mohit Dixit
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दुनिया
ने
तेरी
याद
से
बेगाना
कर
दिया
तुझ
से
भी
दिल-फ़रेब
हैं
ग़म
रोज़गार
के
Faiz Ahmad Faiz
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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ये
ग़म
हमको
पत्थर
कर
देगा
इक
दिन
कोई
आ
कर
हमें
रुलाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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इस
क़दर
जज़्ब
हो
गए
दोनों
दर्द
खेंचूँ
तो
दिल
निकल
आए
Abbas Qamar
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आन
के
इस
बीमार
को
देखे
तुझको
भी
तौफ़ीक़
हुई
लब
पर
उसके
नाम
था
तेरा
जब
भी
दर्द
शदीद
हुआ
Ibn E Insha
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दिल
ना-उमीद
तो
नहीं
नाकाम
ही
तो
है
लंबी
है
ग़म
की
शाम
मगर
शाम
ही
तो
है
Faiz Ahmad Faiz
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ज़ख़्म
दिल
पर
हज़ार
करता
है
और
कहता
है
प्यार
करता
है
दर्द
दिल
में
उतर
गया
कैसे
कोई
अपना
ही
वार
करता
है
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Santosh S Singh
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हम
अपने
दुख
को
गाने
लग
गए
हैं
मगर
इस
में
ज़माने
लग
गए
हैं
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Madan Mohan Danish
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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नशेमन
उस
का
फिर
आबाद
होगा
परिंदा
क़ैदस
आज़ाद
होगा
करेंगे
इश्क़
हम
इक
दूसरे
से
वज़ीफ़ा
ये
तुम्हें
भी
याद
होगा
मिरी
तकलीफ़
बढ़ती
जा
रही
है
मिरा
दुश्मन
यक़ीनन
शाद
होगा
किसी
के
दिल
में
गर
नफ़रत
भरी
है
तो
वो
इंसान
भी
जल्लाद
होगा
गुनाहों
से
जो
बचता
है
यहाँ
पर
बरोज़े
हश्र
भी
वो
शाद
होगा
मेरी
ख़ुशियों
से
वो
जलने
लगा
है
ज़फर
फिर
ग़म
नया
ईजाद
होगा
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Zafar Siddqui
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देख
ली
उसकी
ये
हुनर
मंदी
उस
ने
दिल
को
बना
लिया
बंदी
ये
समर
ये
शज़र
हवा
ठंडी
ख़ूब-तर
शान
है
ख़ुदावंदी
सोचता
हूँ
निकाह
कर
डालूँ
चाहिए
बस
तेरी
रज़ा
मंदी
झूठ
पर
झूठ
बोलते
रहना
सच
पे
लागू
यहाँ
है
पाबंदी
सर
झुका
कर
ज़फर
वो
चलते
हैं
जिनकी
नज़रों
में
है
हया
मंदी
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Zafar Siddqui
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कुछ
नहीं
तेरी
सुनने
वाले
अब
तू
लगा
ले
ज़बाँ
पे
ताले
अब
सब
के
सब
कब
तलक
यूँँ
बैठोगे
पाँव
घर
से
कोई
निकाले
अब
जितना
चाहे
तराश
डाले
तू
ख़ुद
को
तेरे
किया
हवाले
अब
ज़ुल्म
तुम
को
नज़र
नहीं
आता
साफ़
आँखों
के
कर
लो
जाले
अब
ज़ाइक़ा
ही
बिगड़
गया
मुँह
का
ऐसे
महँगे
हुए
निवाले
अब
मौत
अब
जान
ले
के
छोड़ेगी
है
कोई
जो
तुझे
बचा
ले
अब
बुज़दिली
अब
नहीं
दिखाऍंगे
हो
गए
हैं
ज़फर
जियाले
अब
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Zafar Siddqui
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जो
अदब
की
है
पहचान
पढ़ता
हूँ
मैं
मीर-ओ-ग़ालिब
का
दीवान
पढ़ता
हूँ
मैं
मत
पढ़ाओ
मुझे
पाठ
नफ़रत
का
तुम
अम्न
जिस
में
है
क़ुरआन
पढ़ता
हूँ
मैं
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Zafar Siddqui
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यार
की
यार
से
जुदाई
है
हिज्र
की
याद
से
लड़ाई
है
ग़म
से
मेरा
उदास
है
बिस्तर
याद
तेरी
'ज़फर'
जो
आई
है
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Zafar Siddqui
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