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Zafar Siddqui
kuchh nahin teri sunne waale ab
kuchh nahin teri sunne waale ab | कुछ नहीं तेरी सुनने वाले अब
- Zafar Siddqui
कुछ
नहीं
तेरी
सुनने
वाले
अब
तू
लगा
ले
ज़बाँ
पे
ताले
अब
सब
के
सब
कब
तलक
यूँँ
बैठोगे
पाँव
घर
से
कोई
निकाले
अब
जितना
चाहे
तराश
डाले
तू
ख़ुद
को
तेरे
किया
हवाले
अब
ज़ुल्म
तुम
को
नज़र
नहीं
आता
साफ़
आँखों
के
कर
लो
जाले
अब
ज़ाइक़ा
ही
बिगड़
गया
मुँह
का
ऐसे
महँगे
हुए
निवाले
अब
मौत
अब
जान
ले
के
छोड़ेगी
है
कोई
जो
तुझे
बचा
ले
अब
बुज़दिली
अब
नहीं
दिखाऍंगे
हो
गए
हैं
ज़फर
जियाले
अब
- Zafar Siddqui
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यूँँ
तो
वो
शख़्स
बिलकुल
बे-गुनह
है
ज़माने
की
मगर
उस
पे
निगह
है
हमारे
दरमियाँ
जो
दूरियाँ
हैं
यक़ीनन
तीसरी
कोई
वजह
है
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Dileep Kumar
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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गली
में
बैठे
हैं
उसकी
नज़र
जमाए
हुए
हमारे
बस
में
फ़क़त
इंतिज़ार
करना
है
Swapnil Tiwari
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सब
लोग
जिधर
वो
हैं
उधर
देख
रहे
हैं
हम
देखने
वालों
की
नज़र
देख
रहे
हैं
Dagh Dehlvi
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
ख़ाक
करेंगे
Asad Akbarabadi
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पहले
डाली
तेरे
चेहरे
पे
बहुत
देर
नज़र
ईद
का
चाँद
तो
फिर
बाद
में
देखा
मैंने
Vijendra Singh Parwaaz
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तुम्हारी
राह
में
मिट्टी
के
घर
नहीं
आते
इसलिए
तो
तुम्हें
हम
नज़र
नहीं
आते
Waseem Barelvi
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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हुस्न
को
हुस्न
बनाने
में
मिरा
हाथ
भी
है
आप
मुझ
को
नज़र-अंदाज़
नहीं
कर
सकते
Rais Farog
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तीर
का
तेरे
निशाना
आ
गया
सामने
तेरा
दिवाना
आ
गया
ये
मोहब्बत
का
असर
भी
खूब
है
नफरतों
को
सर
झुकाना
आ
गया
हो
गया
मुझको
भी
हासिल
ये
हुनर
पत्थरों
में
गुल
खिलाना
आ
गया
देख
कर
अब
मुस्कुरा
देता
है
वो
दिल
उसे
भी
अब
चुराना
आ
गया
वो
अदब
से
पेश
भी
आने
लगे
प्यार
उन
को
भी
निभाना
आ
गया
ठोकरें
खा
कर
मुझे
भी
दोस्तों
राह
पर
चलना
चलाना
आ
गया
जब
से
आदत
सोचने
की
छोड़
दी
फिर
ज़फर
को
मुस्कुराना
आ
गया
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Zafar Siddqui
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हुई
है
आँख
क्यूँ
पुर-नम
समझ
ले
ज़फ़र
के
प्यार
को
हमदम
समझ
ले
सही
जाती
नहीं
फ़ुर्क़त
तिरी
अब
मिरे
ग़म
को
तू
अपना
ग़म
समझ
ले
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Zafar Siddqui
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आग
से
खेलने
के
चक्कर
में
अपना
वो
हाथ
ही
जला
बैठे
Zafar Siddqui
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सब
हमीं
पर
ही
लाज़मी
है
क्या
तुम
भी
वा'दा
कभी
करो
कोई
Zafar Siddqui
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कितने
प्यारे
हैं
ये
सुहाने
ख़त
पढ़
रहा
हूँ
तिरे
पुराने
ख़त
ख़त
के
लफ्ज़ों
में
है
तिरी
ख़ुशबू
चूमता
रहता
हूँ
सुहाने
ख़त
नींद
भी
फिर
सुहानी
आती
है
जब
भी
पढ़ता
हूँ
मैं
पुराने
ख़त
मैं
भुलाना
तो
चाहता
हूँ
तुझे
पर
नहीं
देते
हैं
भुलाने
ख़त
इश्क़
रुस्वा
न
होने
दूँगा
मैं
ये
किसी
को
नहीं
दिखाने
ख़त
याद
उसकी
ज़फर
सताती
है
देखता
जब
भी
हूँ
पुराने
ख़त
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Zafar Siddqui
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