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Yogendra Singh Raghuwanshi
dard dil men daba liya hogaa
dard dil men daba liya hogaa | दर्द दिल में दबा लिया होगा
- Yogendra Singh Raghuwanshi
दर्द
दिल
में
दबा
लिया
होगा
ग़म
से
वा'दा
निभा
लिया
होगा
क़ब्र
पर
आके
मेरे
क़ातिल
ने
अपना
चेहरा
छुपा
लिया
होगा
- Yogendra Singh Raghuwanshi
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दुनिया
ने
तेरी
याद
से
बेगाना
कर
दिया
तुझ
से
भी
दिल-फ़रेब
हैं
ग़म
रोज़गार
के
Faiz Ahmad Faiz
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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यही
बहुत
है
मिरे
ग़म
में
तुम
शरीक
हुए
मैं
हॅंस
पड़ूँगा
अगर
तुमने
अब
दिलासा
दिया
Imran Aami
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मेरे
तो
ग़म
भी
ज़माने
के
काम
आते
हैं
मैं
रो
पड़ूँ
तो
कई
लोग
मुस्कुराते
हैं
Tariq Qamar
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जब
भी
आता
है
दिसम्बर
ग़म
के
टाँके
खुलते
हैं
याद
है
यूँँ
तेरा
जाना
और
कहना
ख़ुश
रहो
Neeraj Neer
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उदासी
का
सबब
उस
सेे
जो
हम
तब
पूछ
लेते
वजह
फिर
पूछनी
पड़ती
न
शायद
ख़ुद-कुशी
की
Dipendra Singh 'Raaz'
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दुख
कम
मिलें
इस
साल
तुमको
उस
बरस
से
ये
साल
तुमको
हौसला
दे
ये
दु'आ
है
Siddharth Saaz
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फिर
उसी
सितमगर
को
याद
कर
रहे
हैं
हम
यानी
बे-वजह
ग़म
ईजाद
कर
रहे
हैं
हम
Harsh saxena
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दूजों
का
दुख
समझने
को
बे
हद
ज़रूरी
है
थोड़ी
सही
प
दिल
में
अज़ीयत
बनी
रहे
Afzal Ali Afzal
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उसी
मक़ाम
पे
कल
मुझ
को
देख
कर
तन्हा
बहुत
उदास
हुए
फूल
बेचने
वाले
Jamal Ehsani
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मैं
और
बस
मेरी
तन्हाई
हम
दोनों
प्यार
मोहब्बत
और
जुदाई
हम
दोनों
Yogendra Singh Raghuwanshi
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उनकी
आँखें
में
बेईमानी
है
उनके
लहज़े
में
बदगुमानी
है
अब
मोहब्बत
कहाँ
है
रिश्ते
में
उनकी
बातों
में
मेहरबानी
है
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Yogendra Singh Raghuwanshi
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साथ
तेरे
और
चल
सकता
नहीं
राख
हूँ
अब
और
जल
सकता
नहीं
आँधियाँ
आएँ
कि
अब
तूफ़ाँ
चलें
राह
अपनी
मैं
बदल
सकता
नहीं
थक
गया
हूँ
बेसबब
चलते
हुए
इश्क़
में
अब
और
चल
सकता
नहीं
जिस्म
की
बेताबियों
से
मात
खा
रूह
को
अब
और
छल
सकता
नहीं
छोड़
दूँगा
ये
जहाँ
तेरे
लिए
अब
तुझे
मैं
और
खल
सकता
नहीं
कब
तलक
पानी
से
मैं
डरता
रहूँ
बर्फ़
हूँ
पर
और
गल
सकता
नहीं
रात
से
मैं
दोस्ती
कैसे
करूँँ
सूर्य
हूँ
अब
और
ढल
सकता
नहीं
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Yogendra Singh Raghuwanshi
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तुझ
सेे
रिश्ता
क़ायम
रखने
को
जानाँ
जाने
कितनी
बार
गिराया
है
ख़ुद
को
Yogendra Singh Raghuwanshi
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होंठों
पर
इक
बात
छुपाकर
रक्खी
है
प्रिया
नेह
बरसात
छुपाकर
रक्खी
है
जिस
रैना
में
स्वप्न
मिलन
के
देखे
थे
वो
काजल
सी
रात
छुपाकर
रक्खी
है
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Yogendra Singh Raghuwanshi
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