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Vigyan Vrat
dekho kya deewaana hai
dekho kya deewaana hai | देखो क्या दीवाना है
- Vigyan Vrat
देखो
क्या
दीवाना
है
अपना
आप
निशाना
है
यूँँ
तो
साथ
ज़माना
है
पर
ख़ुद
से
बेगाना
है
उस
को
क्या
समझाओगे
वो
ख़ुद
एक
सियाना
है
वो
इतने
दिन
बाद
मिला
मुश्किल
से
पहचाना
है
तुम
से
घर
कहलाता
था
अब
तो
सिर्फ़
घराना
है
- Vigyan Vrat
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हमेशा
यही
भूल
करता
रहा
तेरा
साथ
पाने
को
मरता
रहा
सुनहरे
बहारों
के
मौसम
तले
गुलिस्ताँ
हमारा
बिखरता
रहा
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Ambar
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मैं
जंगलों
की
तरफ़
चल
पड़ा
हूँ
छोड़
के
घर
ये
क्या
कि
घर
की
उदासी
भी
साथ
हो
गई
है
Tehzeeb Hafi
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सात
टुकड़े
हुए
मेरे
दिल
के
एक
हफ़्ता
लगा
सँभलने
में
Tanoj Dadhich
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जाँ
हम
दोनों
साथ
में
अच्छे
लगते
हैं
देखो
शे'र
मुकम्मल
अच्छा
लगता
है
Neeraj Neer
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अच्छी
बुरी
हर
इक
कमी
के
साथ
हैं
हम
यार
आँखों
की
नमी
के
साथ
हैं
दो
जिस्म
ब्याहे
जा
रहे
हैं
आज
भी
हम
सब
पराए
आदमी
के
साथ
हैं
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Neeraj Neer
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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धूप
भी
आराम
करती
थी
जहाँ
अपना
ऐसी
छाँव
से
नाता
रहा
Madan Mohan Danish
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तेरे
साथ
भी
मुश्किल
पड़ता
था
तेरे
बिन
तो
गुजारा
क्या
होता
गर
तू
भी
नहीं
होता
तो
न
जाने
दोस्त
हमारा
क्या
होता
Siddharth Saaz
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मौत
के
साथ
हुई
है
मिरी
शादी
सो
'ज़फ़र'
उम्र
के
आख़िरी
लम्हात
में
दूल्हा
हुआ
मैं
Zafar Iqbal
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ज़िंदगी
तुझ
से
भी
क्या
ख़ूब
त'अल्लुक़
है
मिरा
जैसे
सूखे
हुए
पत्ते
से
हवा
का
रिश्ता
Khalish Akbarabadi
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जितने
लोग
शहर
में
हैं
एक
मुसलसल
डर
में
हैं
मंज़िल
पीछे
छूट
गई
फिर
भी
लोग
सफ़र
में
हैं
सिर्फ़
मिरे
क़दमों
के
निशाँ
मेरी
राहगुज़र
में
हैं
उन
से
उत्तर
क्या
पूछा
प्रश्न
कई
उत्तर
में
हैं
ख़ैर
तो
है
'विज्ञान'
मियाँ
काफ़ी
दिन
से
घर
में
हैं
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Vigyan Vrat
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ख़्वाबों
की
ता'बीरें
भी
हों
यादों
की
तस्वीरें
भी
हों
अपने
उनवानों
जैसी
ही
काश
कि
कुछ
तहरीरें
भी
हों
लाख
तरीक़े
मर
जाने
के
जीने
की
तदबीरें
भी
हों
सिर्फ़
लकीरों
से
क्या
होगा
हाथों
में
तक़दीरें
भी
हों
सिर्फ़
उठें
जो
हक़
की
ख़ातिर
कुछ
ऐसी
शमशीरें
भी
हों
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Vigyan Vrat
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और
सुनाओ
कैसे
हो
तुम
अब
तक
पहले
जैसे
हो
तुम
अच्छा
अब
ये
तो
बतलाओ
कैसे
अपने
जैसे
हो
तुम
यार
सुनो
घबराते
क्यूँ
हो
क्या
कुछ
ऐसे
वैसे
हो
तुम
क्या
अब
अपने
साथ
नहीं
हो
तो
फिर
जैसे
तैसे
हो
तुम
ऐश-परस्ती
तुम
से
तौबा
मज़दूरी
के
पैसे
हो
तुम
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Vigyan Vrat
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जाने
क्या
कुछ
कर
बैठा
है
बहुत
दिनों
से
घर
बैठा
है
वो
मधुमास
लिखे
भी
कैसे
शाखों
पर
पतझर
बैठा
है
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Vigyan Vrat
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