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Vigyan Vrat
aur sunaao kaise ho tum
aur sunaao kaise ho tum | और सुनाओ कैसे हो तुम
- Vigyan Vrat
और
सुनाओ
कैसे
हो
तुम
अब
तक
पहले
जैसे
हो
तुम
अच्छा
अब
ये
तो
बतलाओ
कैसे
अपने
जैसे
हो
तुम
यार
सुनो
घबराते
क्यूँ
हो
क्या
कुछ
ऐसे
वैसे
हो
तुम
क्या
अब
अपने
साथ
नहीं
हो
तो
फिर
जैसे
तैसे
हो
तुम
ऐश-परस्ती
तुम
से
तौबा
मज़दूरी
के
पैसे
हो
तुम
- Vigyan Vrat
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सँभलता
हूँ
तो
ये
लगता
है
जैसे
तुम्हारे
साथ
धोखा
कर
रहा
हूँ
Shariq Kaifi
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बंदा
किसी
के
साथ,
ख़ुदा
हो
किसी
के
साथ
जाने
पराए
शहर
में
क्या
हो
किसी
के
साथ
Mueed Mirza
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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शर्तें
लगाई
जाती
नहीं
दोस्ती
के
साथ
कीजे
मुझे
क़ुबूल
मिरी
हर
कमी
के
साथ
Waseem Barelvi
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ज़रा
पाने
की
चाहत
में
बहुत
कुछ
छूट
जाता
है
नदी
का
साथ
देता
हूँ
समुंदर
रूठ
जाता
है
Aalok Shrivastav
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सवाल
है
घड़ी
ईजाद
करने
वाले
से
मिलायी
पहली
घड़ी
उसने
किस
घड़ी
के
साथ
Raj
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एक
काटा
राम
ने
सीता
के
साथ
दूसरा
वनवास
मेरे
नाम
पर
Nasir Shahzad
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राब्ता
लाख
सही
क़ाफ़िला-सालार
के
साथ
हम
को
चलना
है
मगर
वक़्त
की
रफ़्तार
के
साथ
Qateel Shifai
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आप
के
बाद
हर
घड़ी
हम
ने
आप
के
साथ
ही
गुज़ारी
है
Gulzar
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मेरे
साथ
हँसने
वालों
शरीक
हों
दुख
में
गर
गुलाब
की
ख़्वाहिश
है
तो
चूम
काँटों
को
Neeraj Neer
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देखो
क्या
दीवाना
है
अपना
आप
निशाना
है
यूँँ
तो
साथ
ज़माना
है
पर
ख़ुद
से
बेगाना
है
उस
को
क्या
समझाओगे
वो
ख़ुद
एक
सियाना
है
वो
इतने
दिन
बाद
मिला
मुश्किल
से
पहचाना
है
तुम
से
घर
कहलाता
था
अब
तो
सिर्फ़
घराना
है
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जितने
लोग
शहर
में
हैं
एक
मुसलसल
डर
में
हैं
मंज़िल
पीछे
छूट
गई
फिर
भी
लोग
सफ़र
में
हैं
सिर्फ़
मिरे
क़दमों
के
निशाँ
मेरी
राहगुज़र
में
हैं
उन
से
उत्तर
क्या
पूछा
प्रश्न
कई
उत्तर
में
हैं
ख़ैर
तो
है
'विज्ञान'
मियाँ
काफ़ी
दिन
से
घर
में
हैं
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Vigyan Vrat
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जाने
क्या
कुछ
कर
बैठा
है
बहुत
दिनों
से
घर
बैठा
है
वो
मधुमास
लिखे
भी
कैसे
शाखों
पर
पतझर
बैठा
है
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Vigyan Vrat
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ख़्वाबों
की
ता'बीरें
भी
हों
यादों
की
तस्वीरें
भी
हों
अपने
उनवानों
जैसी
ही
काश
कि
कुछ
तहरीरें
भी
हों
लाख
तरीक़े
मर
जाने
के
जीने
की
तदबीरें
भी
हों
सिर्फ़
लकीरों
से
क्या
होगा
हाथों
में
तक़दीरें
भी
हों
सिर्फ़
उठें
जो
हक़
की
ख़ातिर
कुछ
ऐसी
शमशीरें
भी
हों
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