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Vigyan Vrat
KHvaabon ki ta'beeraain bhi hon
KHvaabon ki ta'beeraain bhi hon | ख़्वाबों की ता'बीरें भी हों
- Vigyan Vrat
ख़्वाबों
की
ता'बीरें
भी
हों
यादों
की
तस्वीरें
भी
हों
अपने
उनवानों
जैसी
ही
काश
कि
कुछ
तहरीरें
भी
हों
लाख
तरीक़े
मर
जाने
के
जीने
की
तदबीरें
भी
हों
सिर्फ़
लकीरों
से
क्या
होगा
हाथों
में
तक़दीरें
भी
हों
सिर्फ़
उठें
जो
हक़
की
ख़ातिर
कुछ
ऐसी
शमशीरें
भी
हों
- Vigyan Vrat
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मुद्दतें
हो
गईं
बिछड़े
हुए
तुम
से
लेकिन
आज
तक
दिल
से
मिरे
याद
तुम्हारी
न
गई
Akhtar Shirani
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उस
की
यादों
की
काई
पर
अब
तो
ज़िंदगी-भर
मुझे
फिसलना
है
Siraj Faisal Khan
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'अमीर'
अब
हिचकियाँ
आने
लगी
हैं
कहीं
मैं
याद
फ़रमाया
गया
हूँ
Ameer Minai
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कितने
नादाँ
हैं
तेरे
भूलने
वाले
कि
तुझे
याद
करने
के
लिए
उम्र
पड़ी
हो
जैसे
Ahmad Faraz
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इतना
तो
याद
है
इक
वा'दा
किया
था
लेकिन
हम
ने
क्या
वा'दा
किया
था
हमें
ये
याद
नहीं
Bismil Dehlavi
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तन्हाइयाँ
तुम्हारा
पता
पूछती
रहीं
शब-भर
तुम्हारी
याद
ने
सोने
नहीं
दिया
Unknown
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तुम
से
छुट
कर
भी
तुम्हें
भूलना
आसान
न
था
तुम
को
ही
याद
किया
तुम
को
भुलाने
के
लिए
Nida Fazli
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अब
तो
उन
की
याद
भी
आती
नहीं
कितनी
तन्हा
हो
गईं
तन्हाइयाँ
Firaq Gorakhpuri
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याद
उसे
इंतिहाई
करते
हैं
सो
हम
उस
की
बुराई
करते
हैं
Jaun Elia
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उदासी
का
सबब
दो
चार
ग़म
होते
तो
कह
देता
फ़ुलाँ
को
भूल
बैठा
हूँ
फ़ुलाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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और
सुनाओ
कैसे
हो
तुम
अब
तक
पहले
जैसे
हो
तुम
अच्छा
अब
ये
तो
बतलाओ
कैसे
अपने
जैसे
हो
तुम
यार
सुनो
घबराते
क्यूँ
हो
क्या
कुछ
ऐसे
वैसे
हो
तुम
क्या
अब
अपने
साथ
नहीं
हो
तो
फिर
जैसे
तैसे
हो
तुम
ऐश-परस्ती
तुम
से
तौबा
मज़दूरी
के
पैसे
हो
तुम
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Vigyan Vrat
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देखो
क्या
दीवाना
है
अपना
आप
निशाना
है
यूँँ
तो
साथ
ज़माना
है
पर
ख़ुद
से
बेगाना
है
उस
को
क्या
समझाओगे
वो
ख़ुद
एक
सियाना
है
वो
इतने
दिन
बाद
मिला
मुश्किल
से
पहचाना
है
तुम
से
घर
कहलाता
था
अब
तो
सिर्फ़
घराना
है
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जाने
क्या
कुछ
कर
बैठा
है
बहुत
दिनों
से
घर
बैठा
है
वो
मधुमास
लिखे
भी
कैसे
शाखों
पर
पतझर
बैठा
है
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Vigyan Vrat
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जितने
लोग
शहर
में
हैं
एक
मुसलसल
डर
में
हैं
मंज़िल
पीछे
छूट
गई
फिर
भी
लोग
सफ़र
में
हैं
सिर्फ़
मिरे
क़दमों
के
निशाँ
मेरी
राहगुज़र
में
हैं
उन
से
उत्तर
क्या
पूछा
प्रश्न
कई
उत्तर
में
हैं
ख़ैर
तो
है
'विज्ञान'
मियाँ
काफ़ी
दिन
से
घर
में
हैं
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Vigyan Vrat
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