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Swapnil Tiwari
tum se ik din kahii milenge ham
tum se ik din kahii milenge ham | तुम से इक दिन कहीं मिलेंगे हम
- Swapnil Tiwari
तुम
से
इक
दिन
कहीं
मिलेंगे
हम
ख़र्च
ख़ुद
को
तभी
करेंगे
हम
इश्क़!
तुझ
को
ख़बर
भी
है?
अब
के
तेरे
साहिल
से
जा
लगेंगे
हम
किस
ने
रस्ते
में
चाँद
रक्खा
है
उस
से
टकरा
के
गिर
पड़ेंगे
हम
आसमानों
में
घर
नहीं
होते
मर
गए
तो
कहाँ
रहेंगे
हम
धूप
निकली
है
तेरी
बातों
की
आज
छत
पर
पड़े
रहेंगे
हम
जो
भी
कहना
है
उस
को
कहना
है
उस
के
कहने
पे
क्या
कहेंगे
हम
रोक
लेंगे
मुझे
तिरे
आँसू
ऐसे
पानी
पे
क्या
चलेंगे
हम
वो
सुनेगी
जो
सुनना
चाहेगी
जो
भी
कहना
है
वो
कहेंगे
हम
- Swapnil Tiwari
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मुझपे
पड़ती
नहीं
बलाओं
की
धूप
सर
पे
साया-फ़िगन
है
माँ
की
दु'आ
Amaan Haider
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उस
वक़्त
भी
अक्सर
तुझे
हम
ढूँढने
निकले
जिस
धूप
में
मज़दूर
भी
छत
पर
नहीं
जाते
Munawwar Rana
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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धूप
निकली
है
बारिशों
के
ब'अद
वो
अभी
रो
के
मुस्कुराए
हैं
Anjum Ludhianvi
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रिश्तों
को
जब
धूप
दिखाई
जाती
है
सिगरेट
से
सिगरेट
सुलगाई
जाती
है
Ankit Gautam
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जली
हैं
धूप
में
शक्लें
जो
माहताब
की
थीं
खिंची
हैं
काँटों
पे
जो
पत्तियाँ
गुलाब
की
थीं
Dagh Dehlvi
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हाल
पूछा
न
करे
हाथ
मिलाया
न
करे
मैं
इसी
धूप
में
ख़ुश
हूँ
कोई
साया
न
करे
Kashif Husain Ghair
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मैं
बहुत
ख़ुश
था
कड़ी
धूप
के
सन्नाटे
में
क्यूँँ
तेरी
याद
का
बादल
मेरे
सर
पर
आया
Ahmad Mushtaq
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घर
में
ठंडे
चूल्हे
पर
अगर
ख़ाली
पतीली
है
बताओ
कैसे
लिख
दूँ
धूप
फागुन
की
नशीली
है
Adam Gondvi
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झूट
पर
उसके
भरोसा
कर
लिया
धूप
इतनी
थी
कि
साया
कर
लिया
Shariq Kaifi
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ये
किताबों
सी
जो
हथेली
है
सब
से
मुश्किल
यही
पहेली
है
मेरी
हम
उम्र
है
ये
तन्हाई
साथ
बचपन
से
मेरे
खेली
है
हँसती
रहती
है
एक
खिड़की
पर
अपनी
दीवार
में
अकेली
है
खुल
रही
है
ये
बात
हम
पर
भी
ज़िंदगी
इक
कठिन
पहेली
है
एक
रौज़न
से
छन
के
आ
तो
गई
घर
में
लेकिन
किरन
अकेली
है
नर्म-ओ-नाज़ुक
सी
ख़ूब-सूरत
सी
ज़िंदगी
प्यार
की
हथेली
है
शुक्रिया
उन
सभी
को
कि
'आतिश'
आँच
जिस
ने
भी
तेरी
झेली
है
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अक्सर
साँसें
रोक
के
सुनता
रहता
हूँ
उस
के
लम्स
बदन
पर
धड़का
करते
हैं
Swapnil Tiwari
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ये
ज़िंदगी
जो
पुकारे
तो
शक
सा
होता
है
कहीं
अभी
तो
मुझे
ख़ुद-कुशी
नहीं
करनी
Swapnil Tiwari
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हर
एक
नींद
को
परख
रहा
हूँ
मैं
तुम्हारे
एक
ख़्वाब
का
जला
हुआ
Swapnil Tiwari
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मिली
है
राहत
हमें
सफ़र
से
थकन
तो
ले
कर
चले
थे
घर
से
अभी
पलक
पर
पलक
न
बैठी
ये
ख़्वाब
आने
लगे
किधर
से
फ़लक
पे
कुछ
देर
चाँद
ठहरा
विदाअ
लेते
हुए
सहरस
तवील
नॉवेल
में
ज़िंदगी
के
तमाम
क़िस्से
हैं
मुख़्तसर
से
वो
देखते
देखते
ही
इक
दिन
उतर
गया
था
मिरी
नज़र
से
उसी
गली
में
नहीं
गए
बस
गुज़र
गए
हम
इधर
उधर
से
गुज़र-बसर
की
है
कोई
सूरत?
ये
सिर्फ़
होगी
गुज़र-बसर
से
धुएँ
से
'आतिश'
जलेंगी
आँखें
जले
नहीं
हम
इस
एक
डर
से
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