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Swapnil Tiwari
akshar saansen rok ke sunta rehta hoonus ke lams badan par dhadka karte hain
akshar saansen rok ke sunta rehta hoonus ke lams badan par dhadka karte hain | अक्सर साँसें रोक के सुनता रहता हूँ
- Swapnil Tiwari
अक्सर
साँसें
रोक
के
सुनता
रहता
हूँ
उस
के
लम्स
बदन
पर
धड़का
करते
हैं
- Swapnil Tiwari
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अब
सुलगती
है
हथेली
तो
ख़याल
आता
है
वो
बदन
सिर्फ़
निहारा
भी
तो
जा
सकता
था
Ameer Imam
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जिस्म
चादर
सा
बिछ
गया
होगा
रूह
सिलवट
हटा
रही
होगी
Kumar Vishwas
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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इसीलिए
तो
हिफ़ाज़त
में
बैठा
रहता
हूँ
मेरे
बदन
में
कोई
नीम
जान
रहता
है
Nirmal Nadeem
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हुस्न
को
हुस्न
बनाने
में
मिरा
हाथ
भी
है
आप
मुझ
को
नज़र-अंदाज़
नहीं
कर
सकते
Rais Farog
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दिसंबर
की
सर्दी
है
उसके
ही
जैसी
ज़रा
सा
जो
छू
ले
बदन
काँपता
है
Amit Sharma Meet
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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दो
आँखें
हैं
दो
पलकें
हैं
जबीं
है
चूमने
ख़ातिर
बहुत
से
ज़ाविए
हैं
उस
बदन
में
देखने
लायक
Siddharth Saaz
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अच्छी
बुरी
हर
इक
कमी
के
साथ
हैं
हम
यार
आँखों
की
नमी
के
साथ
हैं
दो
जिस्म
ब्याहे
जा
रहे
हैं
आज
भी
हम
सब
पराए
आदमी
के
साथ
हैं
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Neeraj Neer
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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जब
भी
दिख
जाएँ
वो
हैरत
करना
ऐसे
रंगों
की
हिफ़ाज़त
करना
उस
का
मुझ
से
यूँँ
ही
लड़
लेना
और
घर
की
चीज़ों
से
शिकायत
करना
मेरे
ता'वीज़
में
जो
काग़ज़
है
उस
पे
लिक्खा
है
मोहब्बत
करना
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मिरे
घर
में
न
होगी
रौशनी
क्या
नहीं
आओगे
इस
जानिब
कभी
क्या
चहकती
बोलती
आँखों
में
चुप्पी
उन्हें
चुभने
लगी
मेरी
कमी
क्या
ख़ुद
उस
का
रंग
पीछा
कर
रहे
हैं
कहीं
देखी
है
ऐसी
सादगी
क्या
लिपटती
हैं
मिरे
पैरों
से
लहरें
मुझे
पहचानती
है
ये
नदी
क्या
मैं
इस
शब
से
तो
उकताया
हुआ
हूँ
सहर
दे
पाएगी
कुछ
ताज़गी
क्या
तिरी
आहट
की
धूप
आती
नहीं
है
समाअत
भी
मिरी
कुम्हला
गई
क्या
ख़मोशी
बर्फ़
सी
'आतिश'
जमी
थी
नज़र
की
आँच
से
वो
गल
गई
क्या
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Swapnil Tiwari
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अब
इक
बीमार
लाओ
तो
बचें
हम
मसीहाई
है
बीमारी
हमारी
Swapnil Tiwari
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जब
गिरे
हम
आसमाँ
से
झूट
के
खुल
न
पाए
बंद
पैराशूट
के
अपना
ही
मेला
सजाने
लग
गए
तुम
हमारी
उँगलियों
से
छूट
के
एक
रस्सी
है
गले
में
मेरे
और
हाथ
में
रेशे
भरे
हैं
जूट
के
मंज़िलों
का
दुख
नया
दुख
था
इन्हें
रो
पड़े
छाले
हमारे
फूट
के
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Swapnil Tiwari
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मज़ाक़
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
ये
ज़िंदगी
जो
पुकारे
तो
शक
सा
होता
है
कहीं
अभी
तो
मुझे
ख़ुद-कुशी
नहीं
करनी
गुनाह-ए-इश्क़
रिहा
होते
ही
करेंगे
फिर
गवाह
बनना
नहीं
मुख़बिरी
नहीं
करनी
बड़े
ही
ग़ुस्से
में
ये
कह
के
उस
ने
वस्ल
किया
मुझे
तो
तुम
से
कोई
बात
ही
नहीं
करनी
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Swapnil Tiwari
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