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Swapnil Tiwari
mazaak sahna nahin hai hañsi nahin karne
mazaak sahna nahin hai hañsi nahin karne | मज़ाक़ सहना नहीं है हँसी नहीं करनी
- Swapnil Tiwari
मज़ाक़
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
ये
ज़िंदगी
जो
पुकारे
तो
शक
सा
होता
है
कहीं
अभी
तो
मुझे
ख़ुद-कुशी
नहीं
करनी
गुनाह-ए-इश्क़
रिहा
होते
ही
करेंगे
फिर
गवाह
बनना
नहीं
मुख़बिरी
नहीं
करनी
बड़े
ही
ग़ुस्से
में
ये
कह
के
उस
ने
वस्ल
किया
मुझे
तो
तुम
से
कोई
बात
ही
नहीं
करनी
- Swapnil Tiwari
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अब
उदास
फिरते
हो
सर्दियों
की
शामों
में
इस
तरह
तो
होता
है
इस
तरह
के
कामों
में
Shoaib Bin Aziz
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लम्हे
उदास
उदास
फ़ज़ाएं
घुटी
घुटी
दुनिया
अगर
यही
है
तो
दुनिया
से
बच
के
चल
Shakeel Badayuni
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रास
आ
जाएगा
इक
रोज़
तेरा
जाना
भी
हम
किसी
दुख
में
लगातार
नहीं
रोते
हैं
Inaam Azmi
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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मेरे
नादाँ
दिल
उदासी
कोई
अच्छी
शय
नहीं
देख
सूखे
फूल
पर
आती
नहीं
हैं
तितलियाँ
Deepak Vikal
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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उसी
मक़ाम
पे
कल
मुझ
को
देख
कर
तन्हा
बहुत
उदास
हुए
फूल
बेचने
वाले
Jamal Ehsani
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मैं
रोज़
रात
यही
सोच
कर
तो
सोता
हूँ
कि
कल
से
वक़्त
निकालूँगा
ज़िन्दगी
के
लिए
Swapnil Tiwari
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अक्सर
साँसें
रोक
के
सुनता
रहता
हूँ
उस
के
लम्स
बदन
पर
धड़का
करते
हैं
Swapnil Tiwari
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अपने
ख़्वाबों
को
इक
दिन
सजाते
हुए
गिर
पड़े
चाँद
तारों
को
लाते
हुए
एक
पुल
पर
खड़ा
शाम
का
आफ़्ताब
सब
को
तकता
है
बस
आते
जाते
हुए
एक
पत्थर
मिरे
सर
पे
आ
कर
लगा
कुछ
फलों
को
शजर
से
गिराते
हुए
ऐ
ग़ज़ल
तेरी
महफ़िल
में
पाई
जगह
इक
ग़लीचा
बिछाते
उठाते
हुए
सुब्ह
इक
गीत
कानों
में
क्या
पड़
गया
कट
गया
दिन
वही
गुनगुनाते
हुए
ज़ात
से
अपनी
'आतिश'
था
ग़ाफ़िल
बहुत
जल
गया
ख़ुद
दिया
इक
जलाते
हुए
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Swapnil Tiwari
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तुम्हारे
शह्र
में
मुझ
ऐसे
जंगली
के
लिए
दरख़्त
ही
नहीं
दिखते
हैं
ख़ुद-कुशी
के
लिए
मैं
रोज़
रात
यही
सोच
कर
तो
सोता
हूँ
के
कल
से
वक़्त
निकालूंगा
ज़िन्दगी
के
लिए
वो
लम्हा
आ
ही
गया
इंतेज़ार
का
लम्हा
घड़ी
भी
बंद
है
पहले
से
इस
घड़ी
के
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Swapnil Tiwari
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तेरे
मिलने
का
आख़िरी
इम्कान
जैसे
मुझ
में
है
एक
नख़लिस्तान
घर
में
लगता
नहीं
है
जी
मेरा
दश्त
में
रह
गया
मिरा
सामान
रेत
में
सीपियाँ
मिली
हैं
मुझे
क्या
समुंदर
था
पहले
रेगिस्तान
लौटे
शायद
इसी
बहाने
वो
रख
लिया
मैं
ने
उस
का
कुछ
सामान
तू
तिरे
इर्द-गिर्द
ही
है
कहीं
हर
तरफ़
ढूँढ़
हर
जगह
को
छान
दूर
तक
कोई
भी
नहीं
दिल
में
आख़िरी
शहर
भी
मिला
वीरान
किस
ने
फूंकी
है
जिस्म
में
साँसें
किस
ने
छेड़ी
है
ज़िंदगी
की
तान
ख़ाक
हो
जाएगा
बदन
'आतिश'
होंगे
इक
दिन
धुआँ
ये
जिस्म
ओ
जान
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Swapnil Tiwari
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