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Swapnil Tiwari
jab gire ham aasmaañ se jhooth ke
jab gire ham aasmaañ se jhooth ke | जब गिरे हम आसमाँ से झूट के
- Swapnil Tiwari
जब
गिरे
हम
आसमाँ
से
झूट
के
खुल
न
पाए
बंद
पैराशूट
के
अपना
ही
मेला
सजाने
लग
गए
तुम
हमारी
उँगलियों
से
छूट
के
एक
रस्सी
है
गले
में
मेरे
और
हाथ
में
रेशे
भरे
हैं
जूट
के
मंज़िलों
का
दुख
नया
दुख
था
इन्हें
रो
पड़े
छाले
हमारे
फूट
के
- Swapnil Tiwari
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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लम्हे
उदास
उदास
फ़ज़ाएं
घुटी
घुटी
दुनिया
अगर
यही
है
तो
दुनिया
से
बच
के
चल
Shakeel Badayuni
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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सभी
के
साथ
दिखना
भी
मगर
सब
सेे
जुदा
रहना
भी
है
उसको
उदासी
साथ
भी
रखनी
है
और
तस्वीर
में
हँसना
भी
है
उसको
Kafeel Rana
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हँसते
हँसते
निकल
पड़े
आँसू
रोते
रोते
कभी
हँसी
आई
Anwar Taban
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मैं
चाहता
था
मुझ
सेे
बिछड़
कर
वो
ख़ुश
रहे
लेकिन
वो
ख़ुश
हुआ
तो
बड़ा
दुख
हुआ
मुझे
Umair Najmi
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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सीधा-साधा
डाकिया
जादू
करे
महान
एक
ही
थैले
में
भरे
आँसू
और
मुस्कान
Nida Fazli
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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मिरे
घर
में
न
होगी
रौशनी
क्या
नहीं
आओगे
इस
जानिब
कभी
क्या
चहकती
बोलती
आँखों
में
चुप्पी
उन्हें
चुभने
लगी
मेरी
कमी
क्या
ख़ुद
उस
का
रंग
पीछा
कर
रहे
हैं
कहीं
देखी
है
ऐसी
सादगी
क्या
लिपटती
हैं
मिरे
पैरों
से
लहरें
मुझे
पहचानती
है
ये
नदी
क्या
मैं
इस
शब
से
तो
उकताया
हुआ
हूँ
सहर
दे
पाएगी
कुछ
ताज़गी
क्या
तिरी
आहट
की
धूप
आती
नहीं
है
समाअत
भी
मिरी
कुम्हला
गई
क्या
ख़मोशी
बर्फ़
सी
'आतिश'
जमी
थी
नज़र
की
आँच
से
वो
गल
गई
क्या
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Swapnil Tiwari
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चारों
ओर
समुंदर
है
मछली
होना
बेहतर
है
कुछ
तो
बाहर
है
कश्ती
कुछ
पानी
के
अंदर
है
नींद
का
रस्ता
छोटा
है
जिस
में
ख़्वाब
की
ठोकर
है
हैं
महफ़ूज़
अल्फ़ाज़
जहाँ
सन्नाटा
वो
लॉकर
है
आँखों
में
चुभती
है
नींद
मेरी
घात
में
बिस्तर
है
मैं
भी
तो
इक
रात
ही
हूँ
चाँद
मिरे
भी
अंदर
है
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Swapnil Tiwari
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नींद
से
आ
कर
बैठा
है
ख़्वाब
मिरे
घर
बैठा
है
अक्स
मिरा
आईने
में
ले
कर
पत्थर
बैठा
है
पलकें
झुकी
हैं
सहरा
की
जिस
पे
समुंदर
बैठा
है
एक
बगूला
यादों
का
खा
कर
चक्कर
बैठा
है
उस
की
नींदों
पर
इक
ख़्वाब
तितली
बन
कर
बैठा
है
रात
की
टेबल
बुक
कर
के
चाँद
डिनर
पर
बैठा
है
अँधियारा
ख़ामोशी
की
ओढ़
के
चादर
बैठा
है
'आतिश'
धूप
गई
कब
की
घर
में
क्यूँँकर
बैठा
है
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Swapnil Tiwari
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नदी
की
लय
पे
ख़ुद
को
गा
रहा
हूँ
मैं
गहरे
और
गहरे
जा
रहा
हूँ
चुरा
लो
चाँद
तुम
उस
सम्त
छुप
कर
मैं
शब
को
उस
तरफ़
रिजहा
रहा
हूँ
वो
सुर
में
सुर
मिलाना
चाहती
है
मैं
अपनी
धुन
बदलता
जा
रहा
हूँ
यही
मौक़ा
है
ख़ारिज
कर
दूँ
ख़ुद
को
मैं
अपने
आप
को
दोहरा
रहा
हूँ
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Swapnil Tiwari
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तुम
से
इक
दिन
कहीं
मिलेंगे
हम
ख़र्च
ख़ुद
को
तभी
करेंगे
हम
इश्क़!
तुझ
को
ख़बर
भी
है?
अब
के
तेरे
साहिल
से
जा
लगेंगे
हम
किस
ने
रस्ते
में
चाँद
रक्खा
है
उस
से
टकरा
के
गिर
पड़ेंगे
हम
आसमानों
में
घर
नहीं
होते
मर
गए
तो
कहाँ
रहेंगे
हम
धूप
निकली
है
तेरी
बातों
की
आज
छत
पर
पड़े
रहेंगे
हम
जो
भी
कहना
है
उस
को
कहना
है
उस
के
कहने
पे
क्या
कहेंगे
हम
रोक
लेंगे
मुझे
तिरे
आँसू
ऐसे
पानी
पे
क्या
चलेंगे
हम
वो
सुनेगी
जो
सुनना
चाहेगी
जो
भी
कहना
है
वो
कहेंगे
हम
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