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Swapnil Tiwari
nadi ki lay pe KHud ko ga raha hooñ
nadi ki lay pe KHud ko ga raha hooñ | नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँ
- Swapnil Tiwari
नदी
की
लय
पे
ख़ुद
को
गा
रहा
हूँ
मैं
गहरे
और
गहरे
जा
रहा
हूँ
चुरा
लो
चाँद
तुम
उस
सम्त
छुप
कर
मैं
शब
को
उस
तरफ़
रिजहा
रहा
हूँ
वो
सुर
में
सुर
मिलाना
चाहती
है
मैं
अपनी
धुन
बदलता
जा
रहा
हूँ
यही
मौक़ा
है
ख़ारिज
कर
दूँ
ख़ुद
को
मैं
अपने
आप
को
दोहरा
रहा
हूँ
- Swapnil Tiwari
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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फूल
ही
फूल
याद
आते
हैं
आप
जब
जब
भी
मुस्कुराते
हैं
Sajid Premi
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फोन
भी
आया
तो
शिकवे
के
लिए
फूल
भी
भेजा
तो
मुरझाया
हुआ
रास्ते
की
मुश्किलें
तो
जान
लूँ
आता
होगा
उसका
ठुकराया
हुआ
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Balmohan Pandey
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चाँद
चेहरा
ज़ुल्फ़
दरिया
बात
ख़ुशबू
दिल
चमन
इक
तुम्हें
दे
कर
ख़ुदा
ने
दे
दिया
क्या
क्या
मुझे
Bashir Badr
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पहले
उसकी
ख़ुशबू
मैंने
ख़ुद
पर
तारी
की
फिर
मैंने
उस
फूल
से
मिलने
की
तैयारी
की
इतना
दुख
था
मुझको
तेरे
लौट
के
जाने
का
मैंने
घर
के
दरवाजों
से
भी
मुँह
मारी
की
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Tehzeeb Hafi
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हज़ारों
साल
नर्गिस
अपनी
बे-नूरी
पे
रोती
है
बड़ी
मुश्किल
से
होता
है
चमन
में
दीदा-वर
पैदा
Allama Iqbal
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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प्यार
की
जोत
से
घर
घर
है
चराग़ाँ
वर्ना
एक
भी
शम्अ
न
रौशन
हो
हवा
के
डर
से
Shakeb Jalali
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आदतन
उसके
लिए
फूल
ख़रीदे
वरना
नहीं
मालूम
वो
इस
बार
यहाँ
है
कि
नहीं
Abbas Tabish
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मिरे
सूरज
आ!
मिरे
जिस्म
पे
अपना
साया
कर
बड़ी
तेज़
हवा
है
सर्दी
आज
ग़ज़ब
की
है
Shahryar
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हमारी
आख़िरी
सिगरेट
थी
ये
अरे
दुनिया
जो
तुझ
पे
ग़ुस्से
में
हमने
अभी
जला
ली
है
Swapnil Tiwari
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जी
बहलता
ही
नहीं
ख़ाली
क़फ़स
से
रंग
जैसे
उड़
गए
हों
कैनवस
से
और
कम
याद
आओगी
अगले
बरस
तुम
अब
के
कम
याद
आई
हो
पिछले
बरस
से
फिर
बचा
जो
चाँद
वो
मैं
पी
गया
था
सब
हुए
मदहोश
जूँ
ही
उस
चरस
से
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Swapnil Tiwari
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जलते
दिए
सा
इक
बोसा
रख
कर
उस
ने
चमक
बढ़ा
दी
है
मेरी
पेशानी
की
Swapnil Tiwari
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नाम
आया
है
तेरा
जब
से
गुनहगारों
में
सब
गवाह
अपनी
गवाही
से
मुकरना
चाहें
Swapnil Tiwari
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मेरे
होंटों
को
छुआ
चाहती
है
ख़ामुशी!
तू
भी
ये
क्या
चाहती
है
मेरे
कमरे
में
नहीं
है
जो
कहीं
अब
वो
खिड़की
भी
खुला
चाहती
है
ज़िंदगी!
गर
न
उधेड़ेगी
मुझे
किस
लिए
मेरा
सिरा
चाहती
है
सारे
हंगा
में
हैं
पर्दे
पर
अब
फ़िल्म
भी
ख़त्म
हुआ
चाहती
है
कब
से
बैठी
है
उदासी
पे
मेरी
याद
की
तितली
उड़ा
चाहती
है
नूर
मिट्टी
में
ही
होगा
उन
की
जिन
चराग़ों
को
हवा
चाहती
है
मेरे
अंदर
है
उम्मस
इस
दर्जा
मुझ
में
बारिश
सी
हुआ
चाहती
है
भोर
आई
है
इरेज़र
की
तरह
शब
की
तहरीर
मिटा
चाहती
है
आसमाँ
में
हैं
सराबों
की
सी
जिन
घटाओं
को
हवा
चाहती
है
चाँद
का
फूल
है
खिलने
को
फिर
शाम
अब
शब
को
छुआ
चाहती
है
फिर
न
लौटेगी
मिरी
आँखों
में
नींद
रंगों
सी
उड़ा
चाहती
है
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Swapnil Tiwari
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