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Swapnil Tiwari
ye kitaabon si jo hatheli hai
ye kitaabon si jo hatheli hai | ये किताबों सी जो हथेली है
- Swapnil Tiwari
ये
किताबों
सी
जो
हथेली
है
सब
से
मुश्किल
यही
पहेली
है
मेरी
हम
उम्र
है
ये
तन्हाई
साथ
बचपन
से
मेरे
खेली
है
हँसती
रहती
है
एक
खिड़की
पर
अपनी
दीवार
में
अकेली
है
खुल
रही
है
ये
बात
हम
पर
भी
ज़िंदगी
इक
कठिन
पहेली
है
एक
रौज़न
से
छन
के
आ
तो
गई
घर
में
लेकिन
किरन
अकेली
है
नर्म-ओ-नाज़ुक
सी
ख़ूब-सूरत
सी
ज़िंदगी
प्यार
की
हथेली
है
शुक्रिया
उन
सभी
को
कि
'आतिश'
आँच
जिस
ने
भी
तेरी
झेली
है
- Swapnil Tiwari
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तुम
भी
साबित
हुए
कमज़ोर
मुनव्वर
राना
ज़िन्दगी
माँगी
भी
तुमने
तो
दवा
से
माँगी
Munawwar Rana
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नहीं
आबो
हवा
में
ताज़गी
अब
दवा
की
सीसियों
में
ज़िन्दगी
है
Umesh Maurya
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जान
भी
अब
दिल
पे
वारी
जाएगी
ये
बला
सर
से
उतारी
जाएगी
एक
पल
तुझ
बिन
गुज़रना
है
कठिन
ज़िन्दगी
कैसे
गुज़ारी
जाएगी
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Anjum Rehbar
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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ज़िंदगी
है
या
कोई
तूफ़ान
है
हम
तो
इस
जीने
के
हाथों
मर
चले
Khwaja Meer Dard
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उसके
जाने
और
आने
में
फ़क़त
यह
फ़र्क़
है
दूर
जाती
मौत
है
तो
पास
आती
ज़िन्दगी
Divy Kamaldhwaj
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पहेली
ज़िंदगी
की
कब
तू
ऐ
नादान
समझेगा
बहुत
दुश्वारियाँ
होंगी
अगर
आसान
समझेगा
Zubair Ali Tabish
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी
में
गुज़री
हमारी
ज़िन्दगी
अब
तू
मुनासिब
सी
सज़ा
दे
गिनती
करके
Kartik tripathi
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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कटती
है
आरज़ू
के
सहारे
पे
ज़िंदगी
कैसे
कहूँ
किसी
की
तमन्ना
न
चाहिए
Shaad Arfi
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ये
वही
हूँ
मैं
वो
ही
हारा
हुआ
फिर
वही
दिन
है
वो
गुज़ारा
हुआ
कैसे
अपनी
तरफ़
चला
आया
मैं
किसी
और
का
पुकारा
हुआ
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Swapnil Tiwari
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हवा
बातों
की
जो
चलने
लगी
है
सो
इक
अफ़्वाह
भी
उड़ने
लगी
है
हम
आवाज़ों
से
ख़ाली
हो
रहे
हैं
ख़ला
में
हूक
सी
उठने
लगी
है
कहाँ
रहता
है
घर
कोई
भी
ख़ाली
इन
आँखों
में
नमी
रहने
लगी
है
हुई
बालिग़
मिरी
तन्हाई
आख़िर
किसी
की
आरज़ू
करने
लगी
है
मुसलसल
रौशनी
की
बारिशों
से
नज़र
में
काई
सी
जमने
लगी
है
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Swapnil Tiwari
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तेरे
मिलने
का
आख़िरी
इम्कान
जैसे
मुझ
में
है
एक
नख़लिस्तान
घर
में
लगता
नहीं
है
जी
मेरा
दश्त
में
रह
गया
मिरा
सामान
रेत
में
सीपियाँ
मिली
हैं
मुझे
क्या
समुंदर
था
पहले
रेगिस्तान
लौटे
शायद
इसी
बहाने
वो
रख
लिया
मैं
ने
उस
का
कुछ
सामान
तू
तिरे
इर्द-गिर्द
ही
है
कहीं
हर
तरफ़
ढूँढ़
हर
जगह
को
छान
दूर
तक
कोई
भी
नहीं
दिल
में
आख़िरी
शहर
भी
मिला
वीरान
किस
ने
फूंकी
है
जिस्म
में
साँसें
किस
ने
छेड़ी
है
ज़िंदगी
की
तान
ख़ाक
हो
जाएगा
बदन
'आतिश'
होंगे
इक
दिन
धुआँ
ये
जिस्म
ओ
जान
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Swapnil Tiwari
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नाम
आया
है
तेरा
जब
से
गुनहगारों
में
सब
गवाह
अपनी
गवाही
से
मुकरना
चाहें
Swapnil Tiwari
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ये
तुमने
कैसा
बना
कर
हमें
किया
है
गुम
ख़ुशी
से
झूम
उठेगा
जिसे
मिलेंगे
हम
Swapnil Tiwari
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