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Sristi Singh
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s | सभी के दिलों में कसक सी उठी है
- Sristi Singh
सभी
के
दिलों
में
कसक
सी
उठी
है
कि
क्यूँँ
आँख
उसकी
चमक
सी
उठी
है
कोई
खिड़कियाँ
खटखटा
कर
गया
है
मिरी
चूड़ियों
में
खनक
सी
उठी
है
वही
इश्क़
फिर
शोर
क्यूँँ
कर
रहा
है
बुझी
आग
फिर
क्यूँँ
दहक
सी
उठी
है
तिरे
लम्स
का
है
अभी
तक
असर
जाँ
बदन
से
मिरे
कुछ
महक
सी
उठी
है
- Sristi Singh
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मेरी
आँखों
को
इक
चेहरा
ज़रूरी
है
भटकते
प्यासे
को
दरिया
ज़रूरी
है
अभी
इस
दर्द
की
लौ
को
छुपाना
है
अभी
दिल
पर
कोई
पर्दा
ज़रूरी
है
तिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
बुरी
होगी
मिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
ज़रूरी
है
अदाकारी
ज़रूरी
है
मगर
फिर
भी
भिखारी
में
हुनर
होना
ज़रूरी
है
तुझे
सृष्टि
शग़फ़
है
बेवफ़ाओं
से
वफ़ादारो
से
याराना
ज़रूरी
है
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ग़म
को
हम
यूँँ
भी
आज़माते
हैं
हिज्र
में
उस
के
जगमगाते
हैं
चाँदनी
रात
मुझ
सेे
कहती
है
ख़ुद
को
इतना
नहीं
सताते
हैं
हमने
चाहा
तुम्हें
नहीं
चाहे
क्या
करें
ख़्वाब
टूट
जाते
हैं
शौक़
था
बस
अकेले
चलने
का
अब
सर-ए-राह
लड़खड़ाते
हैं
इसलिए
फ़ासला
रखा
तुम
से
चूमने
वाले
छोड़
जाते
हैं
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देख
हालत
मरीज़
की
अपने
हर्फ़
समझा
अज़ीज़
की
अपने
दे
तवज्जो
मलाल
को
मेरे
कर
वकालत
तमीज़
की
अपने
कर
चुकी
है
ख़याल
बेगाना
क़द्र
कर
अब
तू
चीज़
की
अपने
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वफ़ा
में
आग
लग
जाए
तो
अच्छा
है
हँसी
ग़मगीन
करने
से
तो
अच्छा
है
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कोई
अपना
नज़र
नहीं
आता
जब
तलक
मेरा
घर
नहीं
आता
ग़म
से
ज़्यादा
शराब
पीते
हैं
इश्क़
का
भी
हुनर
नहीं
आता
दिल
अँधेरे
में
ऐसे
डूबा
है
कि
यहाँ
रहगुज़र
नहीं
आता
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