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Sristi Singh
Merii aankhon ko ik chehraa zaruurii hai
मेरी आँखों को इक चेहरा ज़रूरी है
- Sristi Singh
मेरी
आँखों
को
इक
चेहरा
ज़रूरी
है
भटकते
प्यासे
को
दरिया
ज़रूरी
है
अभी
इस
दर्द
की
लौ
को
छुपाना
है
अभी
दिल
पर
कोई
पर्दा
ज़रूरी
है
तिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
बुरी
होगी
मिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
ज़रूरी
है
अदाकारी
ज़रूरी
है
मगर
फिर
भी
भिखारी
में
हुनर
होना
ज़रूरी
है
तुझे
सृष्टि
शग़फ़
है
बेवफ़ाओं
से
वफ़ादारो
से
याराना
ज़रूरी
है
- Sristi Singh
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निगाहें
चीख
कर
जो
कुछ
भी
कहती
हैं
मिरे
ही
बीस
सालों
की
कमाई
है
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कोई
अपना
नज़र
नहीं
आता
जब
तलक
मेरा
घर
नहीं
आता
ग़म
से
ज़्यादा
शराब
पीते
हैं
इश्क़
का
भी
हुनर
नहीं
आता
दिल
अँधेरे
में
ऐसे
डूबा
है
कि
यहाँ
रहगुज़र
नहीं
आता
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Sristi Singh
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याद
आती
है
तेरी
रुस्वाई
मौसमों
की
हसीन
पुरवाई
उन
दिनों
मुझ
में
तुम
फ़क़त
तुम
थे
आज
मुझ
में
है
बस
ये
तन्हाई
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जब
मुसलसल
दुखों
का
समुंदर
बहे
ग़ैर
को
दुख
बताना
तभी
चाहिए
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ग़म
को
हम
यूँँ
भी
आज़माते
हैं
हिज्र
में
उस
के
जगमगाते
हैं
चाँदनी
रात
मुझ
सेे
कहती
है
ख़ुद
को
इतना
नहीं
सताते
हैं
हमने
चाहा
तुम्हें
नहीं
चाहे
क्या
करें
ख़्वाब
टूट
जाते
हैं
शौक़
था
बस
अकेले
चलने
का
अब
सर-ए-राह
लड़खड़ाते
हैं
इसलिए
फ़ासला
रखा
तुम
से
चूमने
वाले
छोड़
जाते
हैं
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Sristi Singh
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