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Sristi Singh
nigaahen cheekh kar jo kuchh bhi kahti hain
nigaahen cheekh kar jo kuchh bhi kahti hain | निगाहें चीख कर जो कुछ भी कहती हैं
- Sristi Singh
निगाहें
चीख
कर
जो
कुछ
भी
कहती
हैं
मिरे
ही
बीस
सालों
की
कमाई
है
- Sristi Singh
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सभी
ने
बताया
अना
ओढ़ती
है
मगर
यार
वो
तो
हया
ओढ़ती
है
ज़माना
सता
कर
उसे
ख़ुश
हुआ
है
वो
लड़की
जो
हर्फ़-ए-दुआ
ओढ़ती
है
बड़े
हर्फ़
से
शे'र
कहती
हूँ
मैं
फिर
मेरी
हर
ग़ज़ल
हौसला
ओढ़ती
है
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Sristi Singh
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ग़म
को
हम
यूँँ
भी
आज़माते
हैं
हिज्र
में
उस
के
जगमगाते
हैं
चाँदनी
रात
मुझ
सेे
कहती
है
ख़ुद
को
इतना
नहीं
सताते
हैं
हमने
चाहा
तुम्हें
नहीं
चाहे
क्या
करें
ख़्वाब
टूट
जाते
हैं
शौक़
था
बस
अकेले
चलने
का
अब
सर-ए-राह
लड़खड़ाते
हैं
इसलिए
फ़ासला
रखा
तुम
से
चूमने
वाले
छोड़
जाते
हैं
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मुझको
हर
ख़ौफ़
से
रिहा
कर
दो
या
तो
फिर
शाख़
से
हरा
कर
दो
रोज़
उसकी
ही
याद
आती
है
कुछ
नया
तुम
ही
हादसा
कर
दो
ज़ख़्म
सबके
ख़रीद
लूँगी
मैं
गर
उसे
मेरा
हमनवा
कर
दो
ऐसे
क़ातिल
को
क्या
कहेंगे
हम
जाने
दो
उसको
तुम
रिहा
कर
दो
गाहे
गाहे
मैं
मुस्कुराती
हूँ
मुझको
हर
पल
का
ग़म-ज़दा
कर
दो
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सभी
सौदागरों
के
ख़्वाब
होते
हैं
हो
दुख
मेरे
तराज़ू
पे
तो
अच्छा
है
Sristi Singh
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मेरी
आँखों
को
इक
चेहरा
ज़रूरी
है
भटकते
प्यासे
को
दरिया
ज़रूरी
है
अभी
इस
दर्द
की
लौ
को
छुपाना
है
अभी
दिल
पर
कोई
पर्दा
ज़रूरी
है
तिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
बुरी
होगी
मिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
ज़रूरी
है
अदाकारी
ज़रूरी
है
मगर
फिर
भी
भिखारी
में
हुनर
होना
ज़रूरी
है
तुझे
सृष्टि
शग़फ़
है
बेवफ़ाओं
से
वफ़ादारो
से
याराना
ज़रूरी
है
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