gham ko ham yuñ bhi aazmaate hain | ग़म को हम यूँँ भी आज़माते हैं

  - Sristi Singh
ग़मकोहमयूँँभीआज़मातेहैं
हिज्रमेंउसकेजगमगातेहैं
चाँदनीरातमुझसेेकहतीहै
ख़ुदकोइतनानहींसतातेहैं
हमनेचाहातुम्हेंनहींचाहे
क्याकरेंख़्वाबटूटजातेहैं
शौक़थाबसअकेलेचलनेका
अबसर-ए-राहलड़खड़ातेहैं
इसलिएफ़ासलारखातुमसे
चूमनेवालेछोड़जातेहैं
  - Sristi Singh
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