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Sristi Singh
gham ko ham yuñ bhi aazmaate hain
gham ko ham yuñ bhi aazmaate hain | ग़म को हम यूँँ भी आज़माते हैं
- Sristi Singh
ग़म
को
हम
यूँँ
भी
आज़माते
हैं
हिज्र
में
उस
के
जगमगाते
हैं
चाँदनी
रात
मुझ
सेे
कहती
है
ख़ुद
को
इतना
नहीं
सताते
हैं
हमने
चाहा
तुम्हें
नहीं
चाहे
क्या
करें
ख़्वाब
टूट
जाते
हैं
शौक़
था
बस
अकेले
चलने
का
अब
सर-ए-राह
लड़खड़ाते
हैं
इसलिए
फ़ासला
रखा
तुम
से
चूमने
वाले
छोड़
जाते
हैं
- Sristi Singh
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कोई
अपना
नज़र
नहीं
आता
जब
तलक
मेरा
घर
नहीं
आता
ग़म
से
ज़्यादा
शराब
पीते
हैं
इश्क़
का
भी
हुनर
नहीं
आता
दिल
अँधेरे
में
ऐसे
डूबा
है
कि
यहाँ
रहगुज़र
नहीं
आता
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Sristi Singh
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टूट
जाएँ
अगर
ये
खिलौने
अभी
रो
पड़ेंगे
ज़मीं
के
फ़रिश्ते
अभी
देखते
हो
तो
क्या
देखते
हो
भला
थक
गए
राह
घर
ये
दरीचे
अभी
लाख
ग़म
को
सँभालू
सँभलते
नहीं
दस्तरस
में
नहीं
हैं
उजाले
अभी
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मैं
कहूँगी
सभी
से
कि
फ़ुरसत
नहीं
दरमियाँ
तुम
नहीं
कोई
उल्फ़त
नहीं
चूमना
माथ
पे
और
लगना
गले
ख़्वाब
है
ये
मगर
मेरी
क़िस्मत
नहीं
ग़ौर
से
देख
लो
पुर
कशिश
ये
जहाँ
आज
की
रात
है
फिर
तो
क़ुर्बत
नहीं
हादसों
से
कहो
ये
बताएँ
वजह
जो
कुचल
कर
गया
है
वो
मूरत
नहीं
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ख़मोशी
चूमता
है
सुर्ख़
होंठों
से
सो
उसके
आने
पे
चुप्पी
सजाई
है
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निगाहें
चीख
कर
जो
कुछ
भी
कहती
हैं
मिरे
ही
बीस
सालों
की
कमाई
है
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