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Sristi Singh
koii apna nazar nahin aata
koii apna nazar nahin aata | कोई अपना नज़र नहीं आता
- Sristi Singh
कोई
अपना
नज़र
नहीं
आता
जब
तलक
मेरा
घर
नहीं
आता
ग़म
से
ज़्यादा
शराब
पीते
हैं
इश्क़
का
भी
हुनर
नहीं
आता
दिल
अँधेरे
में
ऐसे
डूबा
है
कि
यहाँ
रहगुज़र
नहीं
आता
- Sristi Singh
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ग़म
को
हम
यूँँ
भी
आज़माते
हैं
हिज्र
में
उस
के
जगमगाते
हैं
चाँदनी
रात
मुझ
सेे
कहती
है
ख़ुद
को
इतना
नहीं
सताते
हैं
हमने
चाहा
तुम्हें
नहीं
चाहे
क्या
करें
ख़्वाब
टूट
जाते
हैं
शौक़
था
बस
अकेले
चलने
का
अब
सर-ए-राह
लड़खड़ाते
हैं
इसलिए
फ़ासला
रखा
तुम
से
चूमने
वाले
छोड़
जाते
हैं
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Sristi Singh
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याद
आती
है
तेरी
रुस्वाई
मौसमों
की
हसीन
पुरवाई
उन
दिनों
मुझ
में
तुम
फ़क़त
तुम
थे
आज
मुझ
में
है
बस
ये
तन्हाई
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Sristi Singh
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मेरी
आँखों
को
इक
चेहरा
ज़रूरी
है
भटकते
प्यासे
को
दरिया
ज़रूरी
है
अभी
इस
दर्द
की
लौ
को
छुपाना
है
अभी
दिल
पर
कोई
पर्दा
ज़रूरी
है
तिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
बुरी
होगी
मिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
ज़रूरी
है
अदाकारी
ज़रूरी
है
मगर
फिर
भी
भिखारी
में
हुनर
होना
ज़रूरी
है
तुझे
सृष्टि
शग़फ़
है
बेवफ़ाओं
से
वफ़ादारो
से
याराना
ज़रूरी
है
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Sristi Singh
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जब
मुसलसल
दुखों
का
समुंदर
बहे
ग़ैर
को
दुख
बताना
तभी
चाहिए
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वफ़ा
में
आग
लग
जाए
तो
अच्छा
है
हँसी
ग़मगीन
करने
से
तो
अच्छा
है
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