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Sristi Singh
vafaa men aag lag jaa.e to achha hai
vafaa men aag lag jaa.e to achha hai | वफ़ा में आग लग जाए तो अच्छा है
- Sristi Singh
वफ़ा
में
आग
लग
जाए
तो
अच्छा
है
हँसी
ग़मगीन
करने
से
तो
अच्छा
है
- Sristi Singh
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मुझको
हर
ख़ौफ़
से
रिहा
कर
दो
या
तो
फिर
शाख़
से
हरा
कर
दो
रोज़
उसकी
ही
याद
आती
है
कुछ
नया
तुम
ही
हादसा
कर
दो
ज़ख़्म
सबके
ख़रीद
लूँगी
मैं
गर
उसे
मेरा
हमनवा
कर
दो
ऐसे
क़ातिल
को
क्या
कहेंगे
हम
जाने
दो
उसको
तुम
रिहा
कर
दो
गाहे
गाहे
मैं
मुस्कुराती
हूँ
मुझको
हर
पल
का
ग़म-ज़दा
कर
दो
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निगाहों
से
कहना
ये
बच
कर
रहेंगी
वो
शाइर
है
और
फिर
समाँ
ओढ़ती
है
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देख
हालत
मरीज़
की
अपने
हर्फ़
समझा
अज़ीज़
की
अपने
दे
तवज्जो
मलाल
को
मेरे
कर
वकालत
तमीज़
की
अपने
कर
चुकी
है
ख़याल
बेगाना
क़द्र
कर
अब
तू
चीज़
की
अपने
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टूट
जाएँ
अगर
ये
खिलौने
अभी
रो
पड़ेंगे
ज़मीं
के
फ़रिश्ते
अभी
देखते
हो
तो
क्या
देखते
हो
भला
थक
गए
राह
घर
ये
दरीचे
अभी
लाख
ग़म
को
सँभालू
सँभलते
नहीं
दस्तरस
में
नहीं
हैं
उजाले
अभी
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सभी
के
दिलों
में
कसक
सी
उठी
है
कि
क्यूँँ
आँख
उसकी
चमक
सी
उठी
है
कोई
खिड़कियाँ
खटखटा
कर
गया
है
मिरी
चूड़ियों
में
खनक
सी
उठी
है
वही
इश्क़
फिर
शोर
क्यूँँ
कर
रहा
है
बुझी
आग
फिर
क्यूँँ
दहक
सी
उठी
है
तिरे
लम्स
का
है
अभी
तक
असर
जाँ
बदन
से
मिरे
कुछ
महक
सी
उठी
है
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