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Sristi Singh
dekh haalat mareez kii apne
dekh haalat mareez kii apne | देख हालत मरीज़ की अपने
- Sristi Singh
देख
हालत
मरीज़
की
अपने
हर्फ़
समझा
अज़ीज़
की
अपने
दे
तवज्जो
मलाल
को
मेरे
कर
वकालत
तमीज़
की
अपने
कर
चुकी
है
ख़याल
बेगाना
क़द्र
कर
अब
तू
चीज़
की
अपने
- Sristi Singh
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सभी
सौदागरों
के
ख़्वाब
होते
हैं
हो
दुख
मेरे
तराज़ू
पे
तो
अच्छा
है
Sristi Singh
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मेरी
आँखों
को
इक
चेहरा
ज़रूरी
है
भटकते
प्यासे
को
दरिया
ज़रूरी
है
अभी
इस
दर्द
की
लौ
को
छुपाना
है
अभी
दिल
पर
कोई
पर्दा
ज़रूरी
है
तिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
बुरी
होगी
मिरी
ख़ातिर
नई
दुनिया
ज़रूरी
है
अदाकारी
ज़रूरी
है
मगर
फिर
भी
भिखारी
में
हुनर
होना
ज़रूरी
है
तुझे
सृष्टि
शग़फ़
है
बेवफ़ाओं
से
वफ़ादारो
से
याराना
ज़रूरी
है
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Sristi Singh
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सभी
ने
बताया
अना
ओढ़ती
है
मगर
यार
वो
तो
हया
ओढ़ती
है
ज़माना
सता
कर
उसे
ख़ुश
हुआ
है
वो
लड़की
जो
हर्फ़-ए-दुआ
ओढ़ती
है
बड़े
हर्फ़
से
शे'र
कहती
हूँ
मैं
फिर
मेरी
हर
ग़ज़ल
हौसला
ओढ़ती
है
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Sristi Singh
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जब
मुसलसल
दुखों
का
समुंदर
बहे
ग़ैर
को
दुख
बताना
तभी
चाहिए
Sristi Singh
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टूट
जाएँ
अगर
ये
खिलौने
अभी
रो
पड़ेंगे
ज़मीं
के
फ़रिश्ते
अभी
देखते
हो
तो
क्या
देखते
हो
भला
थक
गए
राह
घर
ये
दरीचे
अभी
लाख
ग़म
को
सँभालू
सँभलते
नहीं
दस्तरस
में
नहीं
हैं
उजाले
अभी
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Sristi Singh
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