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Sristi Singh
yaad aati hai teri ruswaai
yaad aati hai teri ruswaai | याद आती है तेरी रुस्वाई
- Sristi Singh
याद
आती
है
तेरी
रुस्वाई
मौसमों
की
हसीन
पुरवाई
उन
दिनों
मुझ
में
तुम
फ़क़त
तुम
थे
आज
मुझ
में
है
बस
ये
तन्हाई
- Sristi Singh
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सभी
के
दिलों
में
कसक
सी
उठी
है
कि
क्यूँँ
आँख
उसकी
चमक
सी
उठी
है
कोई
खिड़कियाँ
खटखटा
कर
गया
है
मिरी
चूड़ियों
में
खनक
सी
उठी
है
वही
इश्क़
फिर
शोर
क्यूँँ
कर
रहा
है
बुझी
आग
फिर
क्यूँँ
दहक
सी
उठी
है
तिरे
लम्स
का
है
अभी
तक
असर
जाँ
बदन
से
मिरे
कुछ
महक
सी
उठी
है
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सभी
ने
बताया
अना
ओढ़ती
है
मगर
यार
वो
तो
हया
ओढ़ती
है
ज़माना
सता
कर
उसे
ख़ुश
हुआ
है
वो
लड़की
जो
हर्फ़-ए-दुआ
ओढ़ती
है
बड़े
हर्फ़
से
शे'र
कहती
हूँ
मैं
फिर
मेरी
हर
ग़ज़ल
हौसला
ओढ़ती
है
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कोई
अपना
नज़र
नहीं
आता
जब
तलक
मेरा
घर
नहीं
आता
ग़म
से
ज़्यादा
शराब
पीते
हैं
इश्क़
का
भी
हुनर
नहीं
आता
दिल
अँधेरे
में
ऐसे
डूबा
है
कि
यहाँ
रहगुज़र
नहीं
आता
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ग़म
को
हम
यूँँ
भी
आज़माते
हैं
हिज्र
में
उस
के
जगमगाते
हैं
चाँदनी
रात
मुझ
सेे
कहती
है
ख़ुद
को
इतना
नहीं
सताते
हैं
हमने
चाहा
तुम्हें
नहीं
चाहे
क्या
करें
ख़्वाब
टूट
जाते
हैं
शौक़
था
बस
अकेले
चलने
का
अब
सर-ए-राह
लड़खड़ाते
हैं
इसलिए
फ़ासला
रखा
तुम
से
चूमने
वाले
छोड़
जाते
हैं
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मुझको
हर
ख़ौफ़
से
रिहा
कर
दो
या
तो
फिर
शाख़
से
हरा
कर
दो
रोज़
उसकी
ही
याद
आती
है
कुछ
नया
तुम
ही
हादसा
कर
दो
ज़ख़्म
सबके
ख़रीद
लूँगी
मैं
गर
उसे
मेरा
हमनवा
कर
दो
ऐसे
क़ातिल
को
क्या
कहेंगे
हम
जाने
दो
उसको
तुम
रिहा
कर
दो
गाहे
गाहे
मैं
मुस्कुराती
हूँ
मुझको
हर
पल
का
ग़म-ज़दा
कर
दो
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