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Sristi Singh
main kahoongi sabhi se ki fursat nahin
main kahoongi sabhi se ki fursat nahin | मैं कहूँगी सभी से कि फ़ुरसत नहीं
- Sristi Singh
मैं
कहूँगी
सभी
से
कि
फ़ुरसत
नहीं
दरमियाँ
तुम
नहीं
कोई
उल्फ़त
नहीं
चूमना
माथ
पे
और
लगना
गले
ख़्वाब
है
ये
मगर
मेरी
क़िस्मत
नहीं
ग़ौर
से
देख
लो
पुर
कशिश
ये
जहाँ
आज
की
रात
है
फिर
तो
क़ुर्बत
नहीं
हादसों
से
कहो
ये
बताएँ
वजह
जो
कुचल
कर
गया
है
वो
मूरत
नहीं
- Sristi Singh
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मुझको
हर
ख़ौफ़
से
रिहा
कर
दो
या
तो
फिर
शाख़
से
हरा
कर
दो
रोज़
उसकी
ही
याद
आती
है
कुछ
नया
तुम
ही
हादसा
कर
दो
ज़ख़्म
सबके
ख़रीद
लूँगी
मैं
गर
उसे
मेरा
हमनवा
कर
दो
ऐसे
क़ातिल
को
क्या
कहेंगे
हम
जाने
दो
उसको
तुम
रिहा
कर
दो
गाहे
गाहे
मैं
मुस्कुराती
हूँ
मुझको
हर
पल
का
ग़म-ज़दा
कर
दो
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वफ़ा
में
आग
लग
जाए
तो
अच्छा
है
हँसी
ग़मगीन
करने
से
तो
अच्छा
है
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सभी
के
दिलों
में
कसक
सी
उठी
है
कि
क्यूँँ
आँख
उसकी
चमक
सी
उठी
है
कोई
खिड़कियाँ
खटखटा
कर
गया
है
मिरी
चूड़ियों
में
खनक
सी
उठी
है
वही
इश्क़
फिर
शोर
क्यूँँ
कर
रहा
है
बुझी
आग
फिर
क्यूँँ
दहक
सी
उठी
है
तिरे
लम्स
का
है
अभी
तक
असर
जाँ
बदन
से
मिरे
कुछ
महक
सी
उठी
है
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जब
मुसलसल
दुखों
का
समुंदर
बहे
ग़ैर
को
दुख
बताना
तभी
चाहिए
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टूट
जाएँ
अगर
ये
खिलौने
अभी
रो
पड़ेंगे
ज़मीं
के
फ़रिश्ते
अभी
देखते
हो
तो
क्या
देखते
हो
भला
थक
गए
राह
घर
ये
दरीचे
अभी
लाख
ग़म
को
सँभालू
सँभलते
नहीं
दस्तरस
में
नहीं
हैं
उजाले
अभी
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Sristi Singh
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