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Shan Sharma
ye KHushi cigarette samjhti hain
ye KHushi cigarette samjhti hain | ये ख़ुशी सिगरटें समझती हैं
- Shan Sharma
ये
ख़ुशी
सिगरटें
समझती
हैं
छोड़ता
सोग
आसमाँ
पर
मैं
- Shan Sharma
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मज़ा
चहिए
जो
आख़िर
तक
उदासी
से
मोहब्बत
कर
ख़ुशी
का
क्या
है
कब
तब्दील
है
से
थी
में
हो
जाए
Atul K Rai
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है
ख़ुशी
इंतिज़ार
की
हर
दम
मैं
ये
क्यूँँ
पूछूँ
कब
मिलेंगे
आप
Nizam Rampuri
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सब
का
ख़ुशी
से
फ़ासला
एक
क़दम
है
हर
घर
में
बस
एक
ही
कमरा
कम
है
Javed Akhtar
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समुंदर
में
भी
सहरा
देखना
है
मुझे
महफ़िल
में
तन्हा
देख
लेना
Aqib khan
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जो
बुजुर्गों
की
दु'आओं
के
दीयों
से
रौशन
रोज़
उस
घर
में
दीवाली
का
जश्न
होता
है
Pratap Somvanshi
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महफ़िल
में
तेरी
यूँँ
ही
रहे
जश्न-ए-चरागाँ
आँखों
में
ही
ये
रात
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
Sahir Ludhianvi
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मुझे
ख़बर
नहीं
ग़म
क्या
है
और
ख़ुशी
क्या
है
ये
ज़िंदगी
की
है
सूरत
तो
ज़िंदगी
क्या
है
Shadan Ahsan Marehrvi
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ख़ुशी
से
काँप
रही
थीं
ये
उँगलियाँ
इतनी
डिलीट
हो
गया
इक
शख़्स
सेव
करने
में
Fahmi Badayuni
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गुमान
है
या
किसी
विश्वास
में
है
सभी
अच्छे
दिनों
की
आस
में
है
ये
कैसा
जश्न
है
घर
वापसी
का
अभी
तो
राम
ही
वनवास
में
है
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Azhar Iqbal
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पहले-पहल
तो
लड़
लिए
अल्लाह
से
मगर
अब
पेश
आ
रहे
हैं
बड़ी
आजिज़ी
से
हम
Amaan Pathan
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सब्र
का
फल
रहा
न
शीरीं
अब
देर
की
तो
न
गाड़ियाँ
ठहरी
Shan Sharma
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लबों
पे
उसके
मिसरा
लग
रहा
है
मिरा
ये
नाम
नग़मा
लग
रहा
है
पुकारा
है
मुझे
जिस
पल
से
उसने
मुझे
वो
शख़्स
अपना
लग
रहा
है
किसी
सय्याद
का
हो
जाल
जैसे
अदास
उसकी
ख़तरा
लग
रहा
है
महक
है
इस
फ़ज़ा
में
भीनी
भीनी
ये
उसके
घर
का
रस्ता
लग
रहा
है
हमारा
नाम
जोड़ा
जा
रहा
है
मुझे
ये
काम
उम्दा
लग
रहा
है
तुम्हें
ये
चाँद
दिलबर
सा
लगे
है
मुझे
दिलबर
का
झुमका
लग
रहा
है
चुभेगा
मख़मली
बिस्तर
भी
मुझको
मुझे
धरती
पे
अच्छा
लग
रहा
है
उसी
की
राह
मैं
तकता
हूँ
छत
पे
जिसे
सीढ़ी
से
डर
सा
लग
रहा
है
वफ़ा
के
बोझ
से
मैं
दब
रहा
था
चुकाया
क़र्ज़
हल्का
लग
रहा
है
ख़ुशी
से
मिल
रहे
हो
"शान"
इतनी
मुझे
लहजे
में
शिकवा
लग
रहा
है
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Shan Sharma
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आज
बादल
के
सहारे
उसने
ख़त
भेजा
हमें
आसमाँ
क़ासिद
है
कैसा
लफ़्ज़
बरसाता
नहीं
Shan Sharma
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लाख
ग़म
वो
करे
अता
फिर
भी
वो
ख़ुदा
है
ख़ुदा
रहेगा
वो
Shan Sharma
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रात
भर
आँख
पानी-पानी
थी
अश्क़
थे
इश्क़
की
निशानी
थी
तू
था
यकसर
जहाँ
मुझे
हासिल
यार
दिलकश
बहुत
कहानी
थी
दूर
हैं
हम
तो
पड़
गई
नीली
साथ
थे
शाम
ज़ाफ़रानी
थी
नाम
वैसे
ग़ुलाम
मेरा
था
शाह
की
पर
ग़ुलाम
रानी
थी
ज़ुल्फ़
उसकी
तराश
देता
था
मेरी
ख़ातिर
ये
बाग़वानी
थी
सब
नए
ख़त
जला
दिए
मैंने
बात
उन
में
वही
पुरानी
थी
वस्ल
के
दौर
जो
थी
आँखों
में
'शान'
वो
बूँद
शादमानी
थी
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Shan Sharma
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