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Shadan Ahsan Marehrvi
teraa milnaa koi aasaan nahin tha
teraa milnaa koi aasaan nahin tha | तेरा मिलना कोई आसाँ नहीं था
- Shadan Ahsan Marehrvi
तेरा
मिलना
कोई
आसाँ
नहीं
था
मिले
हैं
तुझ
सेे
पहले
ग़म
हज़ारों
- Shadan Ahsan Marehrvi
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नक़्शा
उठा
के
कोई
नया
शहर
ढूँढिए
इस
शहर
में
तो
सब
से
मुलाक़ात
हो
गई
Nida Fazli
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आज
मिलना
था
बिछड़
जाने
की
नीयत
से
हमें
आज
भी
वो
देर
से
पहुँचा
है
कितना
तेज़
है
Tehzeeb Hafi
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ये
किस
ने
बाग़
से
उस
शख़्स
को
बुला
लिया
है
परिंद
उड़
गए
पेड़ों
ने
मुँह
बना
लिया
है
उसे
पता
था
मैं
छूने
में
वक़्त
लेता
हूँ
सो
उस
ने
वस्ल
का
दौरानिया
बढ़ा
लिया
है
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Tehzeeb Hafi
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आप
तो
मुँह
फेर
कर
कहते
हैं
आने
के
लिए
वस्ल
का
वा'दा
ज़रा
आँखें
मिला
कर
कीजिए
Lala Madhav Ram Jauhar
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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बात
से
बात
बनेगी
तू
कभी
बात
तो
कर
आ
ज़रा
पास
मिरे
यार
मुलाक़ात
तो
कर
पूछ
तू
भी
तो
कभी
हाल
हमारे
दिल
का
हाल
से
हाल
मिलाने
की
शुरूआत
तो
कर
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shaan manral
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थी
वस्ल
में
भी
फ़िक्र-ए-जुदाई
तमाम
शब
वो
आए
तो
भी
नींद
न
आई
तमाम
शब
Momin Khan Momin
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चले
भी
आओ
भुला
कर
सभी
गिले-शिकवे
बरसना
चाहिए
होली
के
दिन
विसाल
का
रंग
Azhar Iqbal
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ज़िंदगी
दूर
ही
हमें
कर
दे
मौत
के
बाद
वस्ल
मुमकिन
है
Akash Panwar
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तेरा
मिलना
ख़ुशी
की
बात
सही
तुझ
से
मिल
कर
उदास
रहता
हूँ
Sahir Ludhianvi
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रंग
दिल
पर
वही
है
चाहत
का
इश्क़
दोनों
तरफ़
बराबर
है
देख
तेरे
फ़िराक़
में
जानाँ
किस
तरह
कट
रहा
दिसम्बर
है
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Shadan Ahsan Marehrvi
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लोग
जब
मुस्कुरा
के
मिलते
हैं
कफ़
में
ख़ंजर
छुपा
के
मिलते
हैं
कैसी
सूरत
बना
के
मिलते
हैं
कई
चेहरे
लगा
के
मिलते
हैं
हिज्र
में
उनके
कैसी
गरमाइश
सर्द
झोंके
हवा
के
मिलते
हैं
और
माज़ी
में
कुछ
नहीं
मिलता
चंद
वादे
वफ़ा
के
मिलते
हैं
जल
चुकी
बस्तियों
की
साज़िश
में
कुछ
इरादे
हवा
के
मिलते
हैं
बाद
मुद्दत
बहार
आती
है
पहले
मौसम
ख़ला
के
मिलते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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हैं
लहू
से
कई
गुना
बढ़कर
वो
जो
एहसास
के
मरासिम
हैं
Shadan Ahsan Marehrvi
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अँधेरे
और
काले
हो
गए
हैं
मेरे
दुश्मन
उजाले
हो
गए
हैं
चमन
को
छोड़कर
जब
से
गए
हो
हरे
पत्ते
भी
काले
हो
गए
हैं
तेरी
चाहत
में
पढ़कर
सब
बिरागी
मोहब्बत
करने
वाले
हो
गए
हैं
बहुत
लागत
ग़ज़ल
में
लग
रही
है
के
अब
रोटी
के
लाले
हो
गए
हैं
ज़रा
सा
जो
हुआ
बेख़ुद
तो
मेरे
मुख़ालिफ़
होश
वाले
हो
गए
हैं
करम
की
जिस
सेे
की
हमने
गुज़ारिश
वो
बादल
और
काले
हो
गए
हैं
तेरी
ही
हिज्र
की
वीरानियों
से
मेरे
कमरे
में
जाले
हो
गए
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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जो
भी
कहने
को
मीर
कहते
हैं
बात
उतनी
वज़ीर
कहते
हैं
मुत्तक़ी
करके
दीन
का
सौदा
ख़ुद
को
अहले
ज़मीर
कहते
हैं
बादशाहों
से
कम
नहीं
रुतबा
आप
ख़ुद
को
फ़क़ीर
कहते
हैं
लोग
आकर
फ़रेब
की
ज़द
में
बुत-परस्तों
को
पीर
कहते
हैं
इश्क़
हो
आरज़ी
तो
मत
करना
बात
इतनी
कबीर
कहते
हैं
इश्क़
की
डोर
से
यूँँ
बाँधा
है
लोग
मुझको
असीर
कहते
हैं
एक
मिसरा
तो
कह
के
दिखलाओ
जिस
तरह
शे'र
मीर
कहते
हैं
पीर
मेरा
अली
है
लासानी
पीर
भी
जिसको
मीर
कहते
हैं
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Shadan Ahsan Marehrvi
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